इसके लिए सबसे पहले 2-3 चम्मच चावल को एक गिलास पानी में रातभर या 4-5 घंटे के लिए भिगोकर रख दें. फिर चावल को निथारकर पानी अलग करें. इसी पानी को इस्तेमाल करना है. चावल उबालने के बाद बचे हुए पानी को भी आप इस्तेमाल कर सकते हैं.
त्वचा को होंगे ढेरों फायदे
चावल के पानी में विटामिन बी1, सी और ई की मौजूदगी होने के साथ ही पर्याप्त मात्रा में खनिज और एंटीऑक्सीडेंट भी मौजूद होते हैं, जो ना सिर्फ त्वचा के छिद्रों को कम करते हैं बल्कि इसे जवां बनाए रखने में भी मददगार हैं. इसमें मौजूद विटामिन बी कॉम्प्लेक्स त्वचा की रंगत सुधारने में सहायक है. चावल का पानी त्वचा को हाइड्रेटेड रखता है और इसके चिकनाई बरकरार रखने वाले गुण दरारों को ठीक करते हैं व त्वचा को मुलायम बनाए रखते हैं. चावल के पानी में सूजनरोधी गुण भी होते हैं जो त्वचा पर लालिमा और जलन को कम करने में मदद करता है. इसके अलावा ये त्वचा से मृत कोशिकाओं को हटाने में भी सहायक है जिससे त्वचा साफ और तरोताजा दिखती है.
इस तरह करें उपयोग
क्लींजर के रूप में: चावल के पानी से त्वचा की गंदगी और अशुद्धियों को हटाने में मदद मिलती है. इसलिए इसका प्रयोग त्वचा को साफ करने में किया जा सकता है. एक रुई का फाहा लें और उसमें चावल का पानी लेकर चेहरे पर धीरे-धीरे लगाएं. थोड़ी देर बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लें.
फेस टोनर के रूप में: चावल के पानी को टोनर के रूप में प्रयोग करने के लिए, एक स्प्रे बोतल में भरें और फ्रिज में स्टोर करें. इसके बाद साफ चेहरे पर स्प्रे करके टोनर के रूप में इस्तेमाल करें.
फेस मास्क बनाने में: फेस मास्क बनाने के लिए 2 चम्मच मुल्तानी मिट्टी या बेसन में थोड़ा-सा चावल का पानी मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बनाएं. तैयार पेस्ट को चेहरे पर लगाकर 20 से 30 मिनट बाद गुनगुने पानी से धो लें.
मुंहासे से दिलाएगा निजात: यदि आपको चेहरे पर मुंहासे हो गए हैं तो चावल के पानी को रुई की मदद से प्रभावित हिस्से पर लगाएं. सूख जाने के बाद ठंडे पानी से धो लें. ऐसा करने से आपको मुंहासों से राहत मिलेगी.
काजोल दो बच्चों निसा और युग की मां हैं. अपने बेहद सफल करियर से दूरी करते हुए काजोल ने अपने बच्चों पर पूरी तरह ध्यान दिया था. काजोल ने अपनी मदरहुड जर्नी पर कहा, ‘मुझे मां बनना था और ये मेरी चॉइस थी. मैंने कभी नहीं सोचा कि मैंने अपने बच्चों के लिए कोई त्याग किया या किसी ने भी कोई त्याग किया. मैं ये करना चाहती थी. हालांकि आज मैं ये मानती हूं कि उस वक्त में सच में बहुत ज्यादा ही अपने बच्चों के पीछे लग गई थी. बहुत ज्यादा हर चीज के पीछे लगी रहती थी. लेकिन ये बात मैं आज मानती हूं, पर तब मुझे लगता था कि मैं ही सही थी.’
काजोल ने मांओं को ये सलाह दी कि एक मां को असल में किसी की बात नहीं सुननी चाहिए. एक्ट्रेस ने कहा, ‘हर मां अलग होती है. हर मां का अपने बच्चे बड़े करने का एक तरीका होता है. मुझे लगता है कि हर मां को बहुत सारी सलाहें मिलती हैं पर किसी भी मां को किसी और की एडवाइज कभी नहीं माननी चाहिए. यहां तक अपनी खुद की मां की भी नहीं… क्योंकि ये सच में ये सब बहुत ही अव्यवस्थित है. आपको इस पूरे सफर में कम से 120 ऐसे लोग मिलेंगे जो कहेंग कि ‘मेरी सलाह में तुम्हें ऐसे करना चाहिए, मुझे लगता है ये खाना चाहिए, ये करना चाहिए.’ लेकिन आपको ये सबकुछ नजरअंदाज करते हुए सिर्फ अपने मन की बात सुननी चाहिए. मुझे लगता है कि हर मां को ये खुद तय करना चाहिए कि उनके लिए और बच्चे के लिए क्या बेहतर है. हमेशा याद रखिए आपके लिए किसी और की राय कतई अहम नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ये आपका सफर है. याद रखिए किसी और को न तो इसका क्रेडिट मिलेगा और न ही किसी और पर इल्जाम डाला जाएगा.’
काजोल नई मांओं को सलाह देते हुए कहती हैं, ‘आपको अपने लिए खुद खड़े होना होगा. अलग बच्चों की अलग जरूरत होती है. मुझे याद है कि मेरी बिल्डिंग में एक नई मां थी और मेरी तभी शादी ही हुई थी. उसके 2 बच्चे थे, जिसमें बेटे को डाउन सिंड्रॉम था और एक बेटी थी जो ठीक थी पर वो 1 साल अपने भाई से छोटी थी. दोनों नीचे खेलने आते थे और मां भी आती थी. मां वर्किंग वुमेन थी. उसने अपनी बेटी के साथ ही अपने बच्चे का एडमिशन कराया. अब ऐसा नहीं है, उसे सलाहें नहीं मिली होगी. लेकिन उसने ये अपने हिसाब से तय किया. अच्छा या बुरा आप कुछ भी कहिए पर ये उसका फैसला है. तो मेरी तो यही सलाह है कि ‘किसी की सलाह मत लो.’
]]>यशोदा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल कौशांबी (Yashoda Super-speciality Hospital) की सीनियर कंसलटेंट पीडियाट्रिक्स डॉ. दीपिका रुस्तगी से जानते हैं बेहद आसान उपाय, ताकि आपको और मशक्कत न करनी पड़े और आपका बच्चा खुशी-खुशी खुद ही फोन देखना छोड़ दे.
1. थोड़े से हों सख्त, बदल दें ये रूटीन
पेरेंट्स के लिए जरूरी है कि बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम का एक निश्चित रूटीन तय कर दें. उन्हें साफ-साफ बता दें कि दिन में सिर्फ एक घंटे का स्क्रीन टाइम निश्चित है, फिर चाहे वह टीवी देखें, फोन या टैबलेट. पेरेंट्स थोड़े से सख्त हो जाएं और बच्चों से इस नियम का पालन कराएं. वहीं खुद बिजी हो रहे हैं तो बच्चे को भी बिजी या चुप रखने के लिए फोन पकड़ाने की आदत आज ही बंद कर दें.
2. बच्चों के लिए ढूंढ दें कोई फेवरेट एक्टिविटी
मोबाइल फोन से दूर हटाने का बेस्ट तरीका है कि बच्चों को खेलकूद, किताबें पढ़ने या क्रिएटिव एक्टिविटीज में शामिल करें. पेरेंट्स उन्हें बाहर पार्क आदि में खेलने भेज सकते हैं, साइकिल चलवा सकते हैं. किसी हॉबी क्लास जैसे डांस, स्विमिंग, आउटडोर गेम्स या अन्य एक्टिविटी में नाम लिखवा सकते हैं. इसके लिए बच्चे की च्वॉइस पूछकर फैसला करेंगे तो और बेहतर रिजल्ट आएंगे.
3. खुद से दूर कर दें फोन
जब भी माता-पिता बच्चों के साथ हों तो खुद से फोन को दूर रख दें. उनसे बात करें, उनके साथ खेलें, उनसे पहेलियां पूछें, उन्हें नई-नई बातें बताएं, कहानियां सुनाएं. ऐसा करके बच्चे फोन से खुद ब खुद दूर हो जाएंगे. साथ ही ये चीज पेरेंट्स के लिए भी फायदेमंद है.
4. दोस्तों और खिलौनों का साथ दें
बच्चों को दोस्तों के साथ खेलने दें. वहीं उन्हें खिलौने लाकर दें तो इस बात का ध्यान रखें कि ये खिलौने उनकी उम्र के हिसाब से हों. कई बार उम्र से छोटे या बड़े खिलौनों के साथ बच्चे खेलना पसंद नहीं करते.
5. बच्चों को छोटी-छोटी जिम्मेदारियां दें
बच्चों के साथ समय बिताने के साथ ही उनसे बातें तो करें ही उन्हें घर के छोटे-मोटे कामों की जिम्मेदारियां भी दें. बर्थडे, फंक्शन आदि में छोटे-मोटे कुछ स्पेशल टास्क दें. पौधों में पानी देना, अपना सामान, खिलौने खुद रखना, अपनी अलमारी साफ करना, कुछ डेकोरेट करना आदि भी कराएं. इससे बच्चे बिजी भी रहेंगे और घर में घुलना-मिलना सीखेंगे व फोन से दूर रहेंगे.
मोबाइल की लत है खराब, कर रही बीमार
डॉ. रुस्तगी कहती हैं कि बच्चों में मोबाइल की लत से कई गंभीर समस्याएं हो रही हैं. कुछ दिन पहले एम्स नई दिल्ली की रिसर्च बताती है कि अगर बच्चे लंबे समय तक मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं, तो उनकी आंखों की रोशनी पर बुरा असर पड़ता है. ऐसे बच्चों को मायोपिया की शिकायत बहुत ज्यादा हो रही है. इसके अलावा, बच्चे चिड़चिड़े हो सकते हैं और उन्हें एंग्जायटी, डिप्रेशन और आत्म-संदेह जैसी मानसिक समस्याएं हो सकती हैं. मोबाइल की लत बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है, और इसके चलते उनके विचारों में भी बदलाव देखा जा सकता है. वहीं बच्चे ऑनलाइन साइबर क्राइम के शिकार भी हो सकते हैं.
डॉ. दीपिका रुस्तगी का कहना है कि बच्चों को फोन से दूर रखने के लिए माता-पिता को खुद भी जागरूक होना जरूरी है. बच्चों के ज्यादा फोन इस्तेमाल से उनकी पढ़ाई, नींद और समाजिक जीवन पर बुरा असर पड़ रहा है. इसलिए बच्चों को खेलकूद और अन्य रचनात्मक गतिविधियों में व्यस्त रखना बेहद जरूरी है. कोरोना में फोन जितना फायदेमंद रहा, अब उतना ही नुकसानदेह हो रहा है. कोशिश करें कि बच्चों को ऐसी खबरों की जानकारी भी दें जैसे हाल ही में स्वीडन में 2 साल तक के बच्चों के लिए फोन बैन कर दिया गया है और क्यों कर दिया गया है. इससे बच्चे इसके नुकसान के प्रति भी जागरुक होंगे.
यह कंपनी दुनिया की चार सबसे बड़ी अकाउंटिंग फ़र्म में से एक है. ऑगस्टीन ने कंपनी की भारत यूनिट के प्रमुख राजीव मेमानी को एक ईमेल लिखा है, जिसमें उन्होंने ‘ज़्यादा काम को महिमामंडित करने’ के लिए फ़र्म की निंदा की और आरोप लगाया कि कंपनी के मानवाधिकार मूल्य उन चीजों के बिल्कुल उलट है, जो उनकी बेटी को झेलनी पड़ी.
एन्ना ने 2023 में सीए की परीक्षा पास की थी और मार्च 2024 में EY पुणे में नौकरी शुरू की. चूंकि यह उनकी पहली नौकरी थी, इसलिए उन्होंने ‘उम्मीदों को पूरा करने के लिए जीतोड़ मेहनत की’, लेकिन इस कोशिश ने उनके शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भारी असर डाला. उसकी मां के अनुसार, ‘जॉइन करने के तुरंत बाद ही उसे चिंता और तनाव की वजह से नींद न आने की शिकायत होने लगी. लेकिन उसने कड़ी मेहनत को ही सफलता का रास्ता मानते हुए उसने खुद को आगे बढ़ाना जारी रखा.
‘काम के भारी बोझ के कारण कई कर्मचारियों ने छोड़ दी नौकरी’
पेरायिल की मां ने दावा किया कि चूंकि कई ‘कर्मचारियों ने काम के भारी बोझ के कारण इस्तीफा दे दिया,’ इसलिए उसकी बेटी के बॉस ने उसका काम और बढ़ा दिया. ऑगस्टीन ने कहा, ‘उसका मैनेजर अक्सर क्रिकेट मैचों के दौरान मीटिंग्स को फिर से शेड्यूल कर देता था और दिन के अंत में उसे काम सौंप देता था, जिससे उसका तनाव बढ़ जाता. एक ऑफिस पार्टी में, एक सीनियर अधिकारी नेता ने मज़ाक में कहा भी था कि उसे अपने मैनेजर के नीचे काम करने में मुश्किल होगी, जो दुर्भाग्य से एक वास्तविकता बन गई
जिससे वह बच नहीं सकी.’
हमेशा थककर लौटती थी बेटी
उसने यह भी कहा कि उसकी बेटी ‘देर रात तक और यहां तक कि वीकेंड पर भी’ काम करती थी. उन्होंने अपनी बेटी की बिगड़ती हालत के बारे में बताया, ‘एन्ना पूरी तरह थककर अपने कमरे में लौटती थी, कभी-कभी तो बिना कपड़े बदले बिस्तर पर गिर जाती थी. वह अपना बेहतरीन प्रयास कर रही थी, डेडलाइन को पूरा करने के लिए बहुत मेहनत कर रही थी. वह दिल से लड़ने वाली थीं, आसानी से हार मानने वाली नहीं थीं. हमने उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए कहा, लेकिन वह सीखना चाहती थीं और नया अनुभव हासिल करना चाहती थीं. हालांकि, यह अत्यधिक दबाव उनके लिए भी बहुत ही घातक साबित हुआ और एक दिन उसकी जान चली गई.’
एन्ना की मौत का सटीक कारण साफ नहीं है, लेकिन ईमेल में बताया गया है कि मौत से कुछ हफ्ते पहले, पेरायिल को ‘सीने में जकड़न’ की शिकायत थी. ‘हम उसे पुणे के अस्पताल ले गए. उसका ECG सामान्य था. हमने हार्ट स्पेशलिस्ट को भी दिखाया, जिन्होंने हमें बताया कि उसे पर्याप्त नींद नहीं मिल रही थी और वह बहुत देर से खाना खा रही थी.’ हालांकि इसके बाद 26 साल की एन्ना की 20 जुलाई को मृत्यु हो गई.
एन्ना की मौत और उनकी मां ऑगस्टीन की इस चिट्ठी पर कंपनी की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. वहीं इस ईमेल से महिला की मौत के आसपास की सटीक परिस्थितियां भी स्पष्ट नहीं थीं.
]]>साइंस डायरेक्ट की रिपोर्ट के मुताबिक एस्टोनिया में की गई रिसर्च में पता चला है कि वीडियो गेम्स, सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल मीडिया ज्यादा देखने से बच्चों की ग्लॉसरी, पढ़ने की क्षमता और बातचीत की समझ कम हो सकती है. रिसर्च से पता चला कि जिन बच्चों ने दिनभर में ज्यादा समय स्क्रीन पर बिताया, उनकी लैंग्वेज स्किल्स पर बुरा असर देखने को मिला. दरअसल स्क्रीन पर अधिक समय बिताने वाले बच्चों में किताबें पढ़ने की आदत कम हो जाती है. इससे उनकी शब्दावली और पढ़ने की क्षमता में कमी आ सकती है. स्क्रीन टाइम से बच्चों की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो सकती है.
वैज्ञानिकों ने इस रिसर्च में 400 से ज्यादा बच्चों के माता-पिता के स्क्रीन टाइम, उनके बच्चों के स्क्रीन टाइम और उनके बच्चों की लैंग्वेज स्किल्स के बारे में सर्वे किया था. फ्रंटियर्स इन डेवलपमेंटल साइकोलॉजी में पब्लिश स्टडी में पता चला है कि जो माता-पिता स्क्रीन पर बहुत ज्यादा समय बिताते हैं, उतना ही उनके बच्चे भी इसका उपयोग करते है. रिसर्च की मानें तो जीवन के पहले कुछ सालों के दौरान सबसे प्रभावशाली चीज माता-पिता और बच्चे के बीच रोजाना होने वाली आमने-सामने की मौखिक बातचीत होती है. इससे बच्चे शब्दों को बोलना सीखते हैं.
रिसर्चर्स का कहना है कि स्क्रीन का कम इस्तेमाल करने वाले बच्चों ने व्याकरण और शब्दावली दोनों में अच्छा स्कोर हासिल किया. स्क्रीन के किसी भी प्रकार के उपयोग का बच्चों की भाषा पर अच्छा असर नहीं पड़ा. वीडियो गेम के लिए स्क्रीन का उपयोग करने से बच्चों की भाषा पर नेगेटिव असर पड़ा. अब तक कई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि ज्यादा स्क्रीन से बच्चों का डेवलपमेंट बुरी तरह प्रभावित होता है. स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने से बच्चों की क्रिएटिविटी कम हो सकती है और इससे उनकी फिजिकल एक्टिविटी कम हो सकती है. इससे सामाजिक इंटरैक्शन में कमी आ सकती है.
हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बच्चों की भाषा को बेहतर बनाने के लिए स्क्रीन टाइम कम करें और उन्हें आउटडोर गेम्स, पढ़ाई और सामाजिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए कहें. बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए एनकरेज करें और पढ़ाई को मजेदार बनाने के तरीके ढूंढें. बच्चों को परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने का मौका दें, ताकि वे वास्तविक जीवन में बातचीत और सामाजिक कौशल को बेहतर ढंग से समझ सकें. बच्चों के रुटीन में फिजिकल एक्टिविटी, खेलकूद और क्रिएटिव एक्टिविटी भी शामिल करें. इससे बच्चों का डेवलपमेंट तेजी से होगा.
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