

चौड़ा या बड़ा माथा – जिन लोगों का माथा चौड़ा या बड़ा होता है, वे इंटेलिजेंट, ओपन-माइंडेड, और ऑर्गनाइज़्ड होते हैं. ये लोग जल्दी सीखते हैं और मल्टीटास्किंग में माहिर होते हैं. अक्सर लोग इनसे सलाह लेने आते हैं क्योंकि इन्हें लाइफ के उतार-चढ़ाव को अच्छे से हैंडल करना आता है. सोशल गैदरिंग्स में ये अक्सर अट्रैक्शन का सेंटर बन जाते हैं. सेलिब्रिटीज़ और सक्सेसफुल बिजनेसमैन में भी ये खासियत देखी गई है.
इनकी एक कमी होती है कि कभी-कभी ये गुस्से में आकर अपने अच्छे गुणों को भी ओवरशैडो कर देते हैं. अपने इमोशंस को बैलेंस में रखना इनके लिए जरूरी होता है. साथ ही ये अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में बहुत पैशनेट होते हैं. इनके लिए सपनों और प्रैक्टिकैलिटी के बीच की बाउंड्री अक्सर ब्लर हो जाती है, जिससे इन्हें इमोशनली नुकसान हो सकता है.

पतला माथा – जिनका माथा पतला या कम चौड़ा होता है, वो काफी इमोशनल होते हैं. ऐसे लोग दिल से सोचते हैं. ये लोग अपने इमोशंस को फॉलो करते हैं और लाइफ में अपने साथ समय बिताना पसंद करते हैं. ये ज्यादा लोगों से इमोशनली अटैच नहीं होते ताकि खुद को प्रोटेक्ट कर सकें. पर जब प्यार में होते हैं, तो पूरी तरह से कमिटेड होते हैं.

इनमें दूसरों के लिए इम्पेथी होती है और ये हमेशा जरूरतमंदों की मदद करते हैं, इसलिए लोग इनसे बहुत प्यार करते हैं. इन्हें अपने हिसाब से जीना पसंद होता है और समाज के नियमों की परवाह नहीं करते. लेकिन कभी गुस्से में आ जाएं, तो इसका इम्पैक्ट उनके रिश्तों पर नेगेटिव हो सकता है.

घुमावदार माथा – जिन लोगों का माथा कर्व्ड होता है, वे फ्रेंडली और ईज़ी-गोइंग होते हैं. नए दोस्तों से जल्दी घुल-मिल जाते हैं और जहां भी जाते हैं वहां की एनर्जी को बढ़ा देते हैं. ये लोग इमोशनली सेंसिटिव होते हैं और जानते हैं कि कब, क्या और किससे कहना है. इनके अंदर नेचुरल पॉज़िटिविटी होती है, जो दूसरों को भी इंस्पायर करती है. हालांकि, ये अपनी फीलिंग्स को अंदर ही अंदर छुपा लेते हैं और साइलेंस में दर्द सहते हैं, जो इनके लिए मुश्किल बन सकता है.
M-शेप का माथा- ये लोग क्रिएटिव और आर्टिस्टिक होते हैं, जिनकी नजरें छोटी से छोटी डीटेल्स पकड़ लेती हैं. ये इमोशनल और लॉजिकल, पारंपरिक और मॉडर्न का बेहतरीन मिक्स होते हैं. ऐसे लोग वो काम पसंद करते हैं जहां उन्हें खुद को खुलकर दिखाने का मौका मिले. ये लोग आमतौर पर शांत और पेशंट होते हैं, लेकिन गुस्सा आए तो जल्दी शांत भी हो जाते हैं और दूसरों के प्रति गिले-शिकवे नहीं रखते. ये अपनी जिंदगी बहुत ग्रेसफुली जीते हैं और असफलताओं को अच्छे से हैंडल कर लेते हैं. पर्सनल रिलेशनशिप्स में ये अपने पार्टनर, फैमिली और फ्रेंड्स के लिए बहुत प्रोटेक्टिव होते हैं.
]]>1. हिन्दू धर्म में कुबेर को धन का देवता माना गया है. धनतेरस और दीपावली पर माता लक्ष्मी और श्रीगणेश के साथ इनकी भी पूजा होती है. कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को इनकी विशेष पूजा की जाती है.
2. कुबेरदेव को यक्षों का राजा माना जाता है और उनके राज्य की राजधानी अलकापुरी है. कैलाश के समीप इनकी अलकापुरी है. श्वेतवर्ण, तुन्दिल शरीर, अष्टदन्त एवं तीन चरणों वाले, गदाधारी कुबेर अपनी सत्तर योजन विस्तीर्ण वैश्रवणी सभा में विराजते हैं.
3. दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते थे. सभ्यता के विकास के साथ यह त्योहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मीजी की देव तथा मानव जातियों में.
4. कुबेरे देवता देवताओं के कोषाध्यक्ष थे. सैन्य और राज्य खर्च वे ही संचालित करते थे. यक्षों के राजा कुबेर उत्तर के दिक्पाल तथा शिव के भक्त हैं. भगवान शंकर ने इन्हें अपना नित्य सखा स्वीकार किया है. देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर को पूजने से भी पैसों से जुड़ी तमाम समस्याएं दूर रहती हैं.
5. कुबेर पहले श्रीलंका के राजा था परंतु रावण ने उनसे लंका को हथिया लिया. कुबेर देव के पास एक महत्वपूर्ण पुष्पक विमान और चंद्रकांता मणि भी थी जिसे भी रावण ने हथिया लिया था.
6. कुबेर के संबंध में लोकमानस में एक जनश्रुति प्रचलित है. कहा जाता है कि पूर्वजन्म में कुबेर चोर थे-चोर भी ऐसे कि देव मंदिरों में चोरी करने से भी बाज न आते थे. एक बार चोरी करने के लिए एक शिव मंदिर में घुसे. तब मंदिरों में बहुत माल-खजाना रहता था. उसे ढूंढने-पाने के लिए कुबेर ने दीपक जलाया लेकिन हवा के झोंके से दीपक बुझ गया. कुबेर ने फिर दीपक जलाया, फिर वह बुझ गया. जब यह क्रम कई बार चला, तो भोले-भाले और औघड़दानी शंकर ने इसे अपनी दीपाराधना समझ लिया और प्रसन्न होकर अगले जन्म में कुबेर को धनपति होने का आशीष दे डाला. बाद में भगवान ब्रह्मा ने इन्हें समस्त सम्पत्ति का स्वामी बनाया. यह भी कहा जाता है कि यह कुबड़े और एक आंख वाले थे परतुं भगवती की अराधना से धनपति और निधियों के स्वामी बन गए थे.
7. कुबरे की शादी मूर दानव की पुत्री से हुई थी जिनके दो पुत्र नलकूबेर और मणिग्रीव थे. कुबेर की पुत्री का नाम मीनाक्षी था. अप्सरा रंभा नलकुबेर की पत्नी थी जिस पर रावण ने बुरी नजर डाली थी. यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को शाप दिया कि आज के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसको स्पर्श नहीं कर पाएगा और यदि करेगा तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में बंट जाएगा. नलकूबेर और मणिग्रीव भगवान श्री कृष्णचन्द्र द्वारा नारद जी के शाप से मुक्त होकर कुबेर के साथ रहते थे.
हिंदू धर्म में धनतेरस के दिन कुबेर देव की पूजा करने का विशेष महत्व है. मान्यता है कि इस दिन कुबेर देवता की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में कभी भी आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ता है. पुराणों के अनुसार कुबेर का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था तो प्रश्न यह उठता है कि वह धन के देवता किसी प्रकार बनें?
ऐसे बनें धन के देवता: पौराणिक कथा के अनुसार, कुबेर महाराज पूर्व जन्म में गुणनिधि नामक ब्राह्मण थे. बचपन में कुछ दिनों तक इन्होंने धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया लेकिन बाद में कुसंगति में पड़कर जुआ खेलने लगे. धीरे-धीरे चोरी और दूसरे गलत काम भी करने लगे. जब इस बात का पता उनके पिता को लगा, तो उन्होंने उसे घर से बाहर निकाल दिया. घर से बेघर होने पर वे भटकते हुए एक शिव मंदिर में पहुंचा और वहां प्रसाद चुराने की योजना बनाई. मंदिर में एक पुजारी सो रहा था. उनसे बचने के लिए गुणनिधि ने दीपक पर एक अंगोछा फैला दिया, लेकिन पुजारी ने उन्हें फिर भी चोरी करते हुए पकड़ लिया और इसी हाथापई में गुणनिधि की मृत्यु हो गई.
भगवान शिव ने दिया वरदान: मृत्यु के बाद जब यमदूत गुणनिधि को लेकर आ रहे थे तो दूसरी ओर से भगवान शिव के दूत भी आ रहे थे. भगवान शिव के दूतों ने गुणनिधि को भोलेनाथ के सामने प्रस्तुत किया. तब भगवान शिव को यह प्रतीत हुआ कि गुणनिधि ने अंगोछा बिछाके उनके लिए जल रहे दीपक को बुझने से बचाया है. इसी बात से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गुणनिधि को कुबेर की उपाधि प्रदान की. साथ ही देवताओं के धन का खजांची बनने का भी आशीर्वाद दिया.
भगवान कुबेर की पूजा विधि के बारे में जानकारीः
कई लोग मां लक्ष्मी-गणेश जी की मूर्तियों को किसी भी दिशा में रख देते हैं, जोकि गलत है. ऐसा करने से जातक पर गलत प्रभाव पड़ सकता है. अब सवाल है कि आखिर दिवाली पूजा के दौरान मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमा को किस दिशा में विराजमान करें? किस दिशा में लगाएं लक्ष्मी-गणेश की चौकी? दिवाली पर पूजा का शुभ क्या है
दिवाली पर इस दिशा में करें पूजा
राकेश चतुर्वेदी के मुताबिक, दिवाली पूजा के दौरान दिशा का विशेष ध्यान रखें. ऐसा माना जाता है कि गलत दिशा का चयन करने से जातक शुभ फल की प्राप्ति से वंचित रहता है. वास्तु शास्त्र के अनुसार, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना उत्तर या पूर्व दिशा में करना सबसे उत्तम है. ऐसा करने वाले जातकों की सभी मुरादें पूरी होती है और मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं. घर में धन-धान की कमी नहीं रहती है.
दिवाली की डेट और शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य के मुताबिक, दिवाली का पर्व कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है. अमावस्या तिथि 31 अक्टूबर को दोपहर 03 बजकर 12 मिनट से प्रारंभ होगी और 01 नवंबर को शाम 05 बजकर 53 मिनट तक रहेगी. दिवाली के त्योहार में उदया तिथि नहीं, बल्कि प्रदोष काल का विचार किया जाता है. प्रदोष काल 31 अक्टूबर को ही मिल रहा है, 1 नवंबर को नहीं. इसलिए दिवाली का त्योहार 31 अक्टूबर को मनाना उत्तम रहेगा.
दिवाली पर ऐसे करें पूजा
मंदिर को पूर्ण रूप से व्यवस्थित और साफ करें. इसके बाद कलश को सजाएं उसमें जल, गंगाजल, सुपारी, आदि डालें. हाथ में फूल और अक्षत लेकर मां लक्ष्मी का ध्यान करें. देवी का ध्यान करते उन्हें दूध, दही, शहद, तुलसी और गंगाजल के मिश्रण से स्नान कराएं.
पूजा के लिए ऐसी मूर्ति का करें चयन
ज्योतिषाचार्य बताते है कि, पूजा के समय मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमा को विराजमान करें, लेकिन एक बात का विशेष ध्यान रखें कि मूर्ति कहीं से खंडित नहीं होनी चाहिए. मां लक्ष्मी की मूर्ति आशीर्वाद की मुद्रा में होनी चाहिए. वास्तु शास्त्र के अनुसार, भगवान गणेश की ऐसी प्रतिमा का चयन करें, जिसमे उनकी सूंड़ बाईं ओर घूमी हुई हो.
प्रसाद में हुई मिलावट पर दिया श्राप
तिरुपति बालाजी में उपद्रवियों को आड़े हाथों लेते हुए रामभद्राचार्य ने कहा कि जिस भोग में मछली का तेल, मांस का टुकड़ा मिलाकर हिन्दू आस्था के साथ खिलवाड़ किया गया, मैं श्राप देता हूं उनका नाश होकर रहेगा. किसी भी स्थिति में वह मनुष्य होकर संतुष्ट नहीं रह पाएगा.
हिन्दुत्व है भारतीयता का पर्यायवाची
उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि हिंदुत्व भारतीयता का पर्यायवाची है और जो अत्याचार मुस्लिम धर्म कर रहे हैं, वो सहन नहीं होंगे. अभी दुर्गा पूजा में देखा कितना बड़ा अनर्थ हो गया.’ इसके साथ ही रामभद्राचार्य ने यह भी कहा कि हमारी भविष्यवाणी सिद्ध हुई. मैंने कहा था कि नरेंद्र मोदी तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं.
पीएम मोदी से रखते हैं यह अपेक्षा
संत ने कहा कि पीएम मोदी से कानून सम्मत अपेक्षाएं रखते हैं. उनकी पहली अपेक्षा है, हिंदू मंदिरों से सरकारी हस्तक्षेप हटाया जाए. दूसरी अपेक्षा है, गंगा जमुना की धारा मेल बहे. तीसरी अपेक्षा है हिंदी राष्ट्रभाषा हो और चौथी अपेक्षा है राम चरित्र मानस देश का राष्ट्रीय ग्रंथ हो और हमारा पाक अधिग्रहित कश्मीर भारत में मिल जाए. इस दौरान उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक पर हो रहे अत्याचार पर भी गहरी चिंता जताई.
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचार को लेकर मोहन भागवत ने कहा, ‘बांग्लादेश में वहां के स्थानीय कारणों की वजह से हिंसक तख्तापलट हुआ. इस दौरान एक बार फिर से हिंदू समाज के लोगों पर अत्याचार किए गए. उन अत्याचारों के विरोध में वहां का हिंदू समाज इस बार संगठित होकर स्वयं के बचाव में घर के बाहर आया इसलिए थोड़ा बचाव हुआ. लेकिन यह अत्याचारी कट्टरपंथी स्वभाव जब तक वहां है तब तक वहां के हिंदुओं सहित सभी अल्पसंख्यक समुदायों के सिर पर खतरे की तलवार लटकी रहेगी.’
बांग्लादेश अवैध घुसपैठ पर चेताया
बांग्लादेश से होनी अवैध घुसपैठ को लेकर उन्होंने कहा, ‘बांग्लादेश से भारत में होनेवाली अवैध घुसपैठ व उसके कारण उत्पन्न जनसंख्या असंतुलन गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है. देश में आपसी सद्भाव व देश की सुरक्षा पर भी इस अवैध घुसपैठ के कारण सवाल खड़े होते है. उदारता, मानवता, तथा सद्भावना के पक्षधर सभी के, विशेष कर भारत सरकार तथा विश्वभर के हिंदुओं के सहायता की बांग्लादेश में अल्पसंख्यक बने हिंदु समाज को आवश्यकता रहेगी.’
उन्होंने आगे कहा, ‘असंगठित रहना व दुर्बल रहना यह दुष्टों के द्वारा अत्याचारों को निमंत्रण देना है. यह पाठ भी विश्व भर के हिंदु समाज को ग्रहण करना चाहिए. यह बात यहां रुकती नहीं है. अब वहां भारत से बचने के लिए पाकिस्तान से मिलने की बात हो रही है. ऐसे विमर्श खड़े कर व स्थापित कर कौन से देश भारत पर दबाव बनाना चाहते हैं, इसको बताने की जरूरत नहीं है. इसको लेकर भी सरकार को सोचना होगा.’
हमारा योग सारी दुनिया में एक फैशन बनता जा रहा है- भागवत
जम्मू-कश्मीर में हुए चुनावों को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, ‘जम्मू-कश्मीर के चुनाव भी शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गए. इसका ही परिणाम हम देखते हैं कि सारी दुनिया में भारत की साख बढ़ी है. हमारा योग सारी दुनिया में एक फैशन बनता जा रहा है. उसके शास्त्र और परिणाम को भी दुनिया स्वीकार कर रही है.’
अयोध्या के ज्योतिषी पंडित कल्कि राम बताते हैं कि इस वर्ष दशहरा 12 अक्टूबर को है और दशहरे के दिन दो राज योग का निर्माण हो रहा है, जिसमें शनि और शुक्र क्रमशः शश राज योग और मलयव्य राज योग बना रहे हैं. जिसका प्रभाव राशि चक्र के 12 राशि के जातकों पर देखने को मिलेगा. किसी पर सकारात्मक तो किसी को नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. 12 अक्टूबर दशहरे के दिन शुक्र ग्रह अपनी राशि तुला में स्थित रहेंगे. जिससे मलव्य राजयोग बनेगा. तो वहीं कर्म फल के दाता शनि भी अपनी ही राशि कुंभ में विराजमान रहकर शश राजयोग बना रहे हैं, जिसका प्रभाव तीन राशि के जातकों पर अधिक देखने को मिलेगा. जिसमें वृषभ तुला और मकर राशि के जातक शामिल हैं.
वृषभ राशि: वृषभ राशि के जातकों के लिए यह समय बहुत शुभ रहेगा. करियर में बड़ी सफलता प्राप्त हो सकती है. नौकरी में वेतन बढ़ सकता है. समाज में मान सम्मान बढ़ सकता है. कोर्ट कचहरी के मामले में जीत हासिल हो सकती है.
तुला राशि: तुला राशि के जातकों के लिए यह समय अच्छा रहेगा. मनपसंद नौकरी मिलेगी. कर्ज से निजात मिलेगा. आर्थिक स्थिति मजबूत होगी. रुका हुआ धन वापस होगा. हर काम में सफलता मिलेगी.
मकर राशि : मकर राशि के जातकों के लिए करियर में बड़ी सफलता मिलेगी. आकस्मिक धन का लाभ हो सकता है. कारोबार में अच्छा मुनाफा हो सकता है. बेरोजगार लोगों को रोजगार प्राप्त हो सकता है.
]]>शारदीय नवरात्रि 2024 तीसरा दिन
अश्विन शुक्ल तृतीया तिथि का प्रारंभ: 5 अक्टूबर, आज, 05:30 ए एम से
अश्विन शुक्ल तृतीया तिथि का समापन: 6 अक्टूबर, कल, 07:49 ए एम पर
हिंदू कैलेंडर के अनुसार, उदयातिथि के आधार पर अश्विन शुक्ल तृतीया आज है.
शारदीय नवरात्रि तीसरा दिन 2024 मुहूर्त और योग
ब्रह्म मुहूर्त: 04:39 ए एम से 05:27 ए एम तक
अभिजित मुहूर्त: 11:46 ए एम से 12:33 पी एम तक
सर्वार्थ सिद्धि योग: 06:16 ए एम से 09:33 पी एम तक
रवि योग: 09:33 पी एम से 6 अक्टूबर को 06:17 ए एम तक
अमृत काल: 11:41 ए एम से 01:29 पी एम तक
विजय मुहूर्त: 02:07 पी एम से 02:54 पी एम तक
शारदीय नवरात्रि तीसरा दिन 2024 चौघड़िया मुहूर्त
शुभ-उत्तम मुहूर्त: 07:44 ए एम से 09:13 ए एम तक
चर-सामान्य मुहूर्त: 12:09 पी एम से 01:37 पी एम तक
लाभ-उन्नति मुहूर्त: 01:37 पी एम से 03:06 पी एम तक
अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त: 03:06 पी एम से 04:34 पी एम तक
मां चंद्रघंटा का पूजा मंत्र
1. ऐं श्रीं शक्तयै नमः
2. ओम देवी चन्द्रघण्टायै नमः
3. स्तुति मंत्र: या देवी सर्वभूतेषु मां चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
मां चंद्रघंटा का प्रिय भोग
मां चंद्रघंटा की पूजा करते समय गाय के दूध से बनी खीर, सफेद मिठाई, केला और सेब का भोग लगाएं. ये चीजें मां चंद्रघंटा को प्रिय हैं.
मां चंद्रघंटा की पूजा विधि
नवरात्रि के तीसरे दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके साफ कपड़े पहनें. उसके बाद व्रत और मां चंद्रघंटा की पूजा का संकल्प करें. उसके बाद सर्वार्थ सिद्धि योग में मां चंद्रघंटा की पूजा करें. इस योग में की गई पूजा से आपकी मनोकामना की पूर्ति हो सकती हैं. सबसे पहले मां चंद्रघंटा को गंगाजल से स्नान कराएं. फिर उनको अक्षत्, सिंदूर, पीले रंग के फूल, सफेद कमल पुष्प, धूप, दीप, फल, नैवेद्य आदि चढ़ाएं. इस बीच आपको मां चंद्रघंटा के मंत्र का उच्चारण करना है. फिर देवी चंद्रघंटा को उनका प्रिय भोग खीर, दूध से बनी मिठाई, सेब, केला आदि का भोग लगाएं. उसके बाद दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा का पाठ करें. अंत में मां दुर्गा और मां चंद्रघंटा की आरती करें.
मां चंद्रघंटा की पूजा के फायदे
1. देवी चंद्रघंटा की पूजा करने से दुश्मनों पर जीत हासिल होती है. मान-सम्मान और प्रभाव बढ़ता है.
2. यश और कीर्ति के साथ मां चंद्रघंटा अपने भक्तों को मृत्यु के बाद मोक्ष भी प्रदान करती हैं.
3. वैवाहिक जीवन में खुशहाली के लिए भी मां चंद्रघंटा की पूजा करते हैं.
4. यदि आपकी कुंडली में शुक्र दोष है तो आप मां चंद्रघंटा की पूजा करें. धन, सुख, समृद्धि में बढ़ोत्तरी होगी. विवाह का योग बनेगा.
5. जो व्यक्ति देवी चंद्रघंटा की पूजा करता है, उसके परिवार पर आने वाले संकट टल जाते हैं और संतान सुरक्षित रहती है.
]]>दरअसल दंतेवाड़ा में मौजूद दंतेश्वरी देवी का मंदिर देश के 52 शक्तिपीठों में से एक है. शारदीय नवरात्रि के मौके पर मां दंतेश्वरी देवी के मंदिर में सुबह से ही भक्तों का तांता लगा हुआ है, बड़ी संख्या में बस्तर संभाग के साथ पड़ोसी राज्य उड़ीसा और तेलंगाना से भी श्रद्धालु मां दंतेश्वरी देवी के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं. दंतेश्वरी माता से लोगों की काफी गहरी आस्था जुड़ी हुई है.
देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मंदिर में मनोकामना दीप जलाया है. वहीं अब आगामी 9 दिनों तक नवरात्रि के मौके पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु की भीड़ मंदिर में देवी के दर्शन के लिए पहुंचेगी. इधर टेंपल कमेटी ने भी श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया है.
अगले 9 दिनों तक मंदिर में विशेष पूजा पाठ की जाएगी. इधर दंतेवाड़ा के इस प्रसिद्ध देवी मंदिर में करोड़ों रुपये की लागत से प्रदेश का पहला और सबसे बड़ा कॉरिडोर भी बनकर तैयार हो गया है. इस कॉरिडोर में मां दंतेश्वरी देवी से जुड़ी की किवदंतियां, आदिवासी कल्चर, दंतेवाड़ा का इतिहास समेत अन्य कई तरह की झलकियां देखने को मिलेगी.
हजारों की संख्या में जलाई गयी मनोकामना दीप
नवरात्रि के पावन अवसर पर सुबह से ही देवी के मंदिरों में भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया है. माई दंतेश्वरी बस्तर की कुल देवी मानी जाती है. श्रद्धालुओं का कहना है कि रियासतकाल से ही देवी के प्रति लोगों की सच्ची आस्था जुड़ी है.दूर दराज से लोग माई दंतेश्वरी के दर्शन के लिए बस्तर पंहुचते हैं हजारों की संख्या में मनोकामना दीप जलाकर माई से मन्नते मांगते हैं. दंतेवाड़ा में स्थित मंदिर में इस साल 11 हजार से अधिक मनोकामना दीप जलाए गए हैं.
देश के कोने-कोने के साथ-साथ विदेशों में रहने वाले श्रद्धालुओं ने भी मनोकामना दीप जलाए हैं. मंदिर के प्रधान पुजारी कृष्ण कुमार का कहना है कि बस्तर की आराध्य देवी माई दंतेश्वरी से लोगों की काफी आस्था जुड़ी ई है, यही वजह है कि इन दिनों में स्थानीय श्रद्धालु के साथ दूर दराज से लोग माता के दर्शन के लिए बडी संख्या में मंदिर पंहुचते हैं. कहा जाता है कि आतंक पर सदैव आस्था भारी पड़ी है.यही वजह है कि नक्सल प्रभावित इलाका होने के बावजूद बस्तर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु माई दंतेश्वरी के दर्शन के लिए पंहुचते हैं.
]]>शारदीय नवरात्रि 2024 दूसरा दिन
अश्विन शुक्ल द्वितीया तिथि का प्रारंभ: आज, 4 अक्टूबर, 02:58 एएम से
अश्विन शुक्ल द्वितीया तिथि का समापन: कल, 5 अक्टूबर, 05:30 ए एम पर
उदयातिथि के आधार पर अश्विन शुक्ल द्वितीया तिथि आज है.
शारदीय नवरात्रि दूसरा दिन 2024 मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: 04:38 ए एम से 05:27 ए एम
अभिजीत मुहूर्त: 11:46 ए एम से 12:33 पी एम
अमृत काल: 11:24 ए एम से 01:13 पी एम
विजय मुहूर्त: 02:07 पी एम से 02:55 पी एम
शारदीय नवरात्रि दूसरा दिन 2024 चौघड़िया मुहूर्त
शुभ-उत्तम मुहूर्त: 06:15 ए एम से 07:44 ए एम
चर-सामान्य मुहूर्त: 10:41 ए एम से 12:10 पी एम
लाभ-उन्नति मुहूर्त: 12:10 पी एम से 01:38 पी एम
अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त: 01:38 पी एम से 03:07 पी एम
शुभ-उत्तम मुहूर्त: 04:36 पी एम से 06:04 पी एम
मां ब्रह्मचारिणी पूजा मंत्र
1. ओम देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः
2. ब्रह्मचारयितुम शीलम यस्या सा ब्रह्मचारिणी।
सच्चीदानन्द सुशीला च विश्वरूपा नमोस्तुते।।
3. या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
मां ब्रह्मचारिणी का भोग
पूजा के दौरान मां ब्रह्मचारिणी को पंचामृत और शक्कर का भोग लगाना चाहिए. इससे देवी प्रसन्न होती हैं और मनोकामनाएं पूरी करती हैं.
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि
नवरात्रि के दूसरे दिन सुबह में स्नान आदि से निवृत होकर व्रत और मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का संकल्प करते हैं. उसके बाद मां ब्रह्मचारिणी की पूजा अक्षत्, कुमकुम, फूल, फल, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से करते हैं. पूजा के समय उनके मंत्रों का उच्चारण करें. मां ब्रह्मचारिणी को चमेली के फूलों की माला पहनाएं. उसके बाद शक्कर और पंचामृत का भोग लगाएं. दुर्गा चालीसा का पाठ कर सकते हैं. श्री दुर्गा सप्तशती भी पढ़ें. पूजा के अंत में मां ब्रह्मचारिणी की आरती करें.
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के फायदे
1- जो व्यक्ति व्रत रखकर मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि विधान से करता है. उसको कार्यों में सफलता मिलती है.
2- उसके अंदर जप, तप, त्याग आदि जैसे सात्विक गुणों का विकास होता है.
3-वह विषम परिस्थितियों से लड़ने में सक्षम बन सकता है.