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Thu, 02 Jul 2026 19:38:47 +0000en-US
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1 https://wordpress.org/?v=7.0.27 शहर, 8 डेटा सेंटर… ग्लोबल मैप पर 6 महीने में अचानक उभरा भारत, पैसा लेकर टूट पड़े दुनिया के दिग्गज
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https://chhattisgarh24x7.in/?p=34616#respondThu, 02 Jul 2026 19:38:47 +0000https://mr-bharat.com/?p=34616भारत और जापान के बीच टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में साझेदारी को लेकर गुरुवार को कई समझौते किए गए. इन्हीं में से एक समझौता भारत में डेटा सेंटर लगाने से जुड़ा हुआ है. लेकिन यह पहली बार नहीं है जब किसी ने भारत के साथ ऐसा कुछ करने में दिलचस्पी दिखाई है. इससे पहले भी दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां यहां डेटा सेंटर्स लगाने में या तो रूचि दिखा चुकी हैं या फिर उन पर काम शुरू हो चुका है. भारत पिछले 6 महीने में इन सेंटर्स का सेंटर पॉइंट बनकर उभरा है. यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दुस्तान दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के लिए डेटा सेंटर का नया ठिकाना बन गया है.
गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन, मेटा, एनटीटी डेटा, रिलायंस, अदानी और कई दूसरी कंपनियां भारत में अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं. सिर्फ छह महीनों के भीतर देश के कम से कम सात बड़े शहर मेगा डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स का केंद्र बन चुके हैं. इसे अब सिर्फ निवेश नहीं बल्कि “जियो डेटा पॉलिटिक्स” का नया दौर कहा जा रहा है.
कुछ साल पहले तक तेल, गैस और बंदरगाह किसी भी देश की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत माने जाते थे. अब उनकी जगह डेटा ने ले ली है. एआई मॉडल जितना ज्यादा डेटा प्रोसेस करेंगे, उतने ही बेहतर बनेंगे. यही वजह है कि दुनिया की हर बड़ी टेक कंपनी ऐसे देशों की तलाश में है जहां बड़े पैमाने पर डेटा स्टोर और प्रोसेस किया जा सके. यहीं से जियो डेटा पॉलिटिक्स की शुरुआत होती है. इसका मतलब है कि अब देशों के बीच प्रतिस्पर्धा सिर्फ जमीन या समुद्री रास्तों की नहीं बल्कि डेटा पर भी होगी. जिस देश के पास ज्यादा डेटा, ज्यादा कंप्यूटिंग पावर और ज्यादा डेटा सेंटर होंगे, वही भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर सबसे ज्यादा असर डालेगा.
भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर बेस है. करोड़ों लोग हर दिन यूपीआई, सोशल मीडिया, ई कॉमर्स, वीडियो स्ट्रीमिंग और डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं. इससे हर सेकंड भारी मात्रा में डेटा तैयार होता है, जिसकी जरूरत एआई कंपनियों को सबसे ज्यादा होती है.
दूसरी बड़ी वजह डेटा लोकलाइजेशन है. भारत के नियम लगातार इस दिशा में बढ़ रहे हैं कि भारतीय नागरिकों का संवेदनशील डेटा देश के भीतर ही रखा जाए. इसका मतलब है कि विदेशी कंपनियों को भारत में ही डेटा सेंटर बनाने होंगे.
इसके अलावा भारत में जमीन और निर्माण लागत अमेरिका और यूरोप के मुकाबले काफी कम है. सौर और पवन ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है, जिससे डेटा सेंटर को ग्रीन बिजली मिल सकती है. मुंबई, चेन्नई और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में अंतरराष्ट्रीय समुद्री इंटरनेट केबल सीधे पहुंचती हैं, जिससे दुनिया भर के नेटवर्क से तेज कनेक्टिविटी मिलती है.
]]>https://chhattisgarh24x7.in/?feed=rss2&p=3461605 लाख हर महीने किराए दे देंगे, लेकिन घर नहीं खरीद रहे अमीर लोग, स्मार्ट मूव या बेवकूफी
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https://chhattisgarh24x7.in/?p=34614#respondThu, 02 Jul 2026 19:34:39 +0000https://mr-bharat.com/?p=34614अभिनेत्री करिश्मा कपूर ने हाल ही में मुंबई स्थित अपना एक फ्लैट किराए पर दिया है. इस फ्लैट का मंथली रेंट 5.51 लाख रुपये बताया जा रहा है. इससे पहले भी जब यह फ्लैट रेंट पर था तब साल का भर का किराया 1 करोड़ रुपये से अधिक दिखाया गया था. इस बार साल भर का किराया 70 लाख रुपये के करीब है. ऐसे में एक सवाल लोगों के मन में उठ रहा है कि जब किसी के पास इतना पैसा है ही कि वह सालभर का 1 करोड़ रुपये का रेंट अफोर्ड कर सके तो वे लोग घर खरीद क्यों नहीं लेते हैं. आखिर किराए में इतना पैसा देना समझदारी कैसे हो सकती है.
असल में करोड़पति, बड़े कारोबारी, फिल्म सितारे और हाई नेटवर्थ लोग घर खरीदने का फैसला आम लोगों की तरह नहीं करते. उनके लिए घर सिर्फ रहने की जगह नहीं बल्कि एक फाइनेंशियल एसेट भी होता है. अगर उन्हें लगता है कि करोड़ों रुपये किसी एक प्रॉपर्टी में लगाने से बेहतर है कि वही पैसा दूसरे निवेश में लगाया जाए, तो वे बिना हिचकिचाए लाखों रुपये महीने का किराया देना भी स्वीकार कर लेते हैं.
मान लीजिए मुंबई के किसी प्राइम इलाके में एक लग्जरी अपार्टमेंट की कीमत 35 करोड़ रुपये है. अगर कोई व्यक्ति यह घर खरीदता है तो उसकी पूरी पूंजी का बड़ा हिस्सा एक ही एसेट में फंस जाता है. दूसरी तरफ अगर वही 35 करोड़ रुपये बिजनेस, शेयर बाजार, प्राइवेट इक्विटी, स्टार्टअप या दूसरे निवेश में लगाए जाएं और वहां 12 से 15 प्रतिशत सालाना रिटर्न मिले, तो हर साल कई करोड़ रुपये की कमाई हो सकती है. ऐसे में 60 से 70 लाख रुपये सालाना किराया देना उनके लिए कहीं ज्यादा फायदेमंद सौदा बन जाता है.
किराये का गणित भी खरीदारी के पक्ष में नहीं
भारत के बड़े शहरों में लग्जरी घरों की रेंटल यील्ड आमतौर पर 2 से 4 प्रतिशत के बीच रहती है. इसका मतलब है कि 30 करोड़ रुपये के घर का सालाना किराया करीब 60 लाख से 1 करोड़ रुपये के बीच हो सकता है. यानी किराया, घर की कुल कीमत के मुकाबले काफी कम होता है. इसी वजह से कई अमीर लोग खरीदने की बजाय किराये पर रहना ज्यादा फायदे का सौदा मानते हैं.
कैश फ्लो बना रहता है मजबूत
बिजनेस करने वाले लोगों के लिए नकदी सबसे बड़ी ताकत होती है. अगर करोड़ों रुपये किसी घर में लगा दिए जाएं तो जरूरत पड़ने पर उन्हें निकालना आसान नहीं होता. लेकिन वही पैसा अगर निवेश में लगा रहे तो नए कारोबार, नए निवेश या किसी मौके पर तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है. इसलिए कई अमीर लोग अपनी पूंजी को चलन में रखना पसंद करते हैं.
जरूरत के हिसाब से बदल सकते हैं घर
बड़े कारोबारी, सीईओ और फिल्मी सितारों का काम अक्सर अलग अलग शहरों और इलाकों में होता है. आज मुंबई के बांद्रा में रहना जरूरी है तो कुछ साल बाद जुहू, दिल्ली, दुबई या लंदन में रहना पड़ सकता है. किराये का घर उन्हें यह आजादी देता है कि बिना करोड़ों रुपये की प्रॉपर्टी बेचने की चिंता किए वे आसानी से नई जगह शिफ्ट हो सकें. समुद्र के सामने अपार्टमेंट, प्रीमियम टावर, प्राइवेट क्लब, स्विमिंग पूल, जिम, हाई सिक्योरिटी और दूसरी लग्जरी सुविधाओं वाले घर खरीदने के लिए कई बार 50 करोड़ से 100 करोड़ रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं. लेकिन वही सुविधाएं किराये पर कहीं कम लागत में मिल जाती हैं. इसलिए कई लोग मालिक बनने की बजाय उपयोग करने को ज्यादा महत्व देते हैं.
]]>https://chhattisgarh24x7.in/?feed=rss2&p=346140अब बारिश की बूंदों पर लग रहा सट्टा! पहले ही महीने करोड़ों का दांव
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https://chhattisgarh24x7.in/?p=34588#respondWed, 01 Jul 2026 19:49:19 +0000https://mr-bharat.com/?p=34588भारतीय वित्तीय बाजार में कमोडिटी, शेयर और करेंसी के बाद अब एक बिल्कुल नए एसेट क्लास की एंट्री हुई है, जहां लोग मानसून और बारिश की बूंदों पर दांव लगा रहे हैं. नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (NCDEX) ने मई 2026 के आखिर में देश का पहला एक्सचेंज-ट्रेडेड रेनफॉल फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट लॉन्च किया है, जिसे ‘RAINMUMBAI’ नाम दिया गया है. अपने लॉन्च के पहले ही महीने में इस कॉन्ट्रैक्ट ने बाजार को चौंकाते हुए लगभग 20,000 लॉट्स का मजबूत ट्रेडिंग वॉल्यूम दर्ज किया है.
दिलचस्प बात यह है कि इस साल मुंबई में मानसून उम्मीद से काफी देरी से पहुंचा, जिसने इस नए वेदर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट को अपनी उपयोगिता साबित करने का बेहतरीन मौका दे दिया. जून का महीना मुंबई के लिए पिछले कई सालों में सबसे सूखा रहा, जिससे पानी की किल्लत को लेकर चिंताएं बढ़ गईं. हालांकि महीने के अंत में बारिश ने रफ्तार पकड़ी, लेकिन फिर भी जून में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई. मौसम के इसी उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता ने इस वेदर कॉन्ट्रैक्ट की अहमियत को ट्रेडर्स और बिजनेस हाउसेज के बीच काफी बढ़ा दिया.
सरल शब्दों में कहें तो यह कॉन्ट्रैक्ट एक आर्थिक तराजू की तरह काम करता है, जो मुंबई की सामान्य बारिश (LPA) और वास्तविक बारिश के बीच के अंतर को मापता है; अगर कोई बिजनेस मानसून की कमी या देरी से होने वाले वित्तीय नुकसान से बचना चाहता है, तो वह मौसम विभाग (IMD) के आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर NCDEX एक्सचेंज पर ‘RAINMUMBAI’ कॉन्ट्रैक्ट खरीदता है, और जैसे ही वास्तविक बारिश सामान्य से कम या ज्यादा होती है, तो उसके अनुसार हुए नफा-नुकसान का हिसाब-किताब सीधे नकद पैसों (Cash-Settled) के लेनदेन से बराबर कर दिया जाता है.
पहले ही महीने में मिले शानदार संकेत
एक्सचेंज द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, शुरुआती महीने में औसत दैनिक ट्रेडिंग वॉल्यूम करीब 1,000 लॉट्स रहा. वहीं 15 जून को सबसे व्यस्त ट्रेडिंग सेशन देखा गया, जब अकेले एक दिन में 2,039 लॉट्स का व्यापार हुआ. एक्सचेंज का कहना है कि शुरुआती दौर मुख्य रूप से बाजार को समझाने और अभ्यस्त करने का था, लेकिन इस कॉन्ट्रैक्ट ने समय से पहले ही अपना मुख्य उद्देश्य पूरा करना शुरू कर दिया है. यह वायदा कीमतें (Futures Prices) केवल प्रतिक्रिया नहीं दे रही हैं, बल्कि आने वाले दिनों में होने वाली बारिश के पैटर्न का एक सटीक अनुमान और दिशात्मक संकेतक भी प्रदान कर रही हैं.
वित्तीय जोखिम से सुरक्षा (Hedging) का नया हथियार
इस कॉन्ट्रैक्ट को डिजाइन करने के पीछे मुख्य उद्देश्य उन व्यवसायों और संस्थाओं को वित्तीय सुरक्षा देना है, जिनका कामकाज सीधे तौर पर मानसून पर निर्भर करता है. उदाहरण के लिए, कृषि आधारित कंपनियां, लॉजिस्टिक्स सेक्टर, इंश्योरेंस कंपनियां और बिजली उत्पादन से जुड़ी इकाइयां बारिश में भारी उतार-चढ़ाव के कारण होने वाले घाटे को कम करने के लिए इस कॉन्ट्रैक्ट का उपयोग हेजिंग (Financial Exposure Hedging) के रूप में कर सकती हैं.
]]>https://chhattisgarh24x7.in/?feed=rss2&p=345880180 की रफ्तार और होटल जैसा आराम, हवाई जहाज छोड़िए अब लग्जरी ट्रेन से करिए बेंगलुरु-टू-मुंबई का सफर
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https://chhattisgarh24x7.in/?p=34586#respondWed, 01 Jul 2026 19:47:27 +0000https://mr-bharat.com/?p=34586अगर आप अक्सर बेंगलुरु से मुंबई आते-जाते हैं, तो आपके लिए बड़ी खुशखबरी है. महंगे हवाई टिकट और ट्रेनों के झटकों से अब आपको राहत मिलने वाली है. देश की सबसे आलीशान ‘वंदे भारत स्लीपर ट्रेन’ का नया रैक बेंगलुरु पहुंच चुका है. नारंगी और ग्रे रंग की यह खूबसूरत ट्रेन पूरी तरह तैयार है. बहुत जल्द यह बेंगलुरु से मुंबई के बीच पटरियों पर दौड़ती नजर आएगी. यह देश की दूसरी वंदे भारत स्लीपर ट्रेन होगी. इसे खास तौर पर रात के सफर के लिए बनाया गया है. इससे पहले जनवरी में हावड़ा-कामाख्या वंदे भारत स्लीपर शुरू हुई थी. उस ट्रेन ने यात्रियों का करीब 6 घंटे का समय बचाया था. अब ऐसा ही कुछ बेंगलुरु, पुणे और मुंबई रूट पर होने जा रहा. है. इससे यात्रियों को फ्लाइट जैसा आराम बहुत कम खर्च में मिलेगा.
इस शानदार ट्रेन को बीईएमएल (BEML) ने चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री के साथ मिलकर बनाया है. रेलवे अधिकारियों के मुताबिक अभी इस ट्रेन की फाइनल टेस्टिंग चल रही है. इसके लिए ट्रेन को बेंगलुरु के सर एम. विश्वेश्वरैया टर्मिनस पर खड़ा किया गया है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पहले ही कहा था कि यह सर्विस जल्द शुरू होगी. इससे बेंगलुरु, हुब्बल्ली, बेलगावी, पुणे और मुंबई के बीच आना-जाना बहुत आसान हो जाएगा.
रात के सफर को आरामदायक बनाने के लिए इस ट्रेन के अंदरूनी हिस्से को किसी लग्जरी होटल जैसा लुक दिया गया है. यह पूरी तरह वातानुकूलित (AC) ट्रेन है और इसमें 16 कोच हैं. इनमें 11 थर्ड एसी, 4 सेकंड एसी और 1 फर्स्ट एसी कोच शामिल है. ट्रेन में एक साथ 823 यात्री सफर कर सकेंगे. सफर में झटके न लगें, इसके लिए एडवांस सस्पेंशन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. साथ ही ट्रेन के अंदर बाहर का शोर भी सुनाई नहीं देगा.
सुरक्षा के लिए लगा ‘कवच’ सिस्टम
सुरक्षा के मामले में भी यह ट्रेन नंबर वन है. इसमें भारत का अपना ‘कवच’ सेफ्टी सिस्टम लगा है, जो दो ट्रेनों को आपस में टकराने से रोकता है. इमरजेंसी में सीधे ड्राइवर से बात करने के लिए हर कोच में ‘टॉक-बैक’ बटन दिया गया है. फर्स्ट एसी कोच के केबिन में पूरी प्राइवेसी मिलेगी. इसके गद्दे भी बहुत आरामदायक हैं, जिससे यात्रियों को घर जैसी नींद आएगी.
]]>https://chhattisgarh24x7.in/?feed=rss2&p=345860अब फटाफट बुक हो जाएगी आपकी तत्काल टिकट, रेलवे ने 5 गुना बढ़ाई क्षमता, दलालों पर भी लगेगी लगाम
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https://chhattisgarh24x7.in/?p=34584#respondWed, 01 Jul 2026 19:43:22 +0000https://mr-bharat.com/?p=34584अगर आप भी तत्काल टिकट बुक करते समय आईआरसीटीसी (IRCTC) ऐप के स्लो होने से परेशान रहते हैं, तो आपके लिए अच्छी खबर है. भारतीय रेलवे अपने टिकट बुकिंग सिस्टम (PRS) को बदलने जा रहा है. इस नए बदलाव के बाद रेलवे का सिस्टम एक मिनट में 1.25 लाख टिकट बुक कर सकेगा. यह नया सिस्टम ऑनलाइन टिकट बुकिंग का पूरा अनुभव बदल देगा. अभी रेलवे का सिस्टम एक मिनट में केवल 25 हजार टिकट ही बुक कर पाता है. नया सिस्टम आने के बाद टिकट बुकिंग की स्पीड पांच गुना बढ़ जाएगी. रेल मंत्रालय की तकनीकी शाखा ‘क्रिस’ (CRIS) ने अपने 41वें स्थापना दिवस पर यह जानकारी दी है. अधिकारियों के मुताबिक इससे त्योहारों के समय टिकट बुक करना बहुत आसान हो जाएगा.
इस नए सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा आम यात्रियों को मिलेगा. रोज़ सुबह 10 और 11 बजे तत्काल टिकट बुक करते समय सर्वर पर बहुत लोड रहता है. इस वजह से अक्सर ऐप हैंग हो जाता है या यूजर लॉग-आउट हो जाता है. रेलवे का मानना है कि नया सिस्टम इस भारी लोड को आसानी से संभाल लेगा. इससे यात्रियों को बिना किसी रुकावट के टिकट मिल सकेगा.
सुपरऐप ‘RailOne’ और AI पर फोकस
रेलवे अब अपने नए सुपरऐप ‘रेलवन’ (RailOne) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर भी काम कर रहा है. क्रिस के प्रबंध निदेशक जीवीएल सत्य कुमार ने बताया कि रेलवन ऐप को लोग बहुत पसंद कर रहे हैं. अब एआई की मदद से यात्रियों को उनकी पसंद के हिसाब से बेहतर सेवाएं दी जाएंगी. साथ ही साइबर सुरक्षा को भी मजबूत किया जा रहा है. इस नए अपग्रेड से टिकट दलालों के अवैध सॉफ्टवेयर पर भी लगाम लगेगी. त्योहारों के दिनों में होने वाली भारी भीड़ को भी यह सिस्टम आराम से संभाल लेगा. आने वाले कुछ महीनों में यह नया सिस्टम पूरी तरह चालू हो जाएगा. इसके बाद आम जनता को ऑनलाइन टिकट बुकिंग की माथापच्ची से हमेशा के लिए राहत मिल जाएगी.
]]>https://chhattisgarh24x7.in/?feed=rss2&p=345840क्या होता है फिस्कल डेफिसिट, क्यों सरकार करती है इसे ट्रैक, क्या कुछ कह रहे हैं अप्रैल-मई के आंकड़े
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https://chhattisgarh24x7.in/?p=34558#respondTue, 30 Jun 2026 11:23:13 +0000https://mr-bharat.com/?p=34558केंद्र सरकार के वित्तीय खातों की निगरानी करने वाली संस्था महालेखा नियंत्रक यानी सीजीए ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती दो महीनों के आंकड़े जारी कर दिए हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल और मई के दौरान देश का राजकोषीय घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट 1.62 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया है. यह स्थिति साफ दर्शाती है कि नए वित्त वर्ष की शुरुआत से ही सरकार की खर्च करने की रफ्तार काफी तेज बनी हुई है, जिसके चलते शुरुआती साठ दिनों में ही सालाना बजटीय लक्ष्य का करीब दस प्रतिशत हिस्सा पूरा हो चुका है.
इस बार के आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ मई के महीने में देखने को मिला, जब टैक्स और अन्य माध्यमों से हुई बंपर कमाई की बदौलत सरकार को दो लाख करोड़ रुपये का शुद्ध सरप्लस यानी अधिशेष हासिल हुआ. हालांकि, मई की इस छप्परफाड़ आमदनी के बावजूद सरकार अप्रैल महीने में हुए बड़े घाटे के असर को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकी, जिसके कारण पहले दो महीनों का संयुक्त नतीजा अंततः घाटे के रूप में ही सामने आया है.
आम जनता की भाषा में कहें तो राजकोषीय घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट सीधे तौर पर सरकार की उधारी को दर्शाता है. जब सरकार की कुल कमाई यानी टैक्स और अन्य स्रोतों से होने वाली आमदनी, उसके द्वारा किए जाने वाले कुल खर्च के मुकाबले कम रह जाती है, तो उस अंतर को पाटने के लिए सरकार को बाजार या अन्य माध्यमों से कर्ज लेना पड़ता है. इसी कुल कर्ज की जरूरत को राजकोषीय घाटा कहा जाता है. अप्रैल और मई के महीनों में सरकार की कुल प्राप्तियां 7.19 लाख करोड़ रुपये रही, जबकि उसका कुल व्यय 8.81 लाख करोड़ रुपये (बजट अनुमान का 16.5 प्रतिशत) पर पहुंच गया, जिसके कारण यह 1.62 लाख करोड़ रुपये का अंतर पैदा हुआ है.
सरकार क्यों ट्रैक करती है
कोई भी देश अपनी मर्जी से जितना चाहे उतना खर्च नहीं कर सकता, इसलिए सरकार राजकोषीय घाटे को बहुत बारीकी से ट्रैक करती है क्योंकि यह देश की अंतरराष्ट्रीय साख से जुड़ा मामला है. यदि घाटा एक तय सीमा के भीतर रहता है, तो दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियां देश की इकोनॉमी को मजबूत मानती हैं और विदेशी निवेशक बिना किसी डर के देश में पैसा लगाते हैं. इसके विपरीत, यदि घाटा लगातार बढ़ता रहे तो यह संकेत देता है कि देश अपनी क्षमता से अधिक कर्ज ले रहा है, जिससे वैश्विक बाजार में देश की छवि पर बुरा असर पड़ता है और सरकार के लिए नया कर्ज लेना बेहद महंगा हो जाता है.
]]>https://chhattisgarh24x7.in/?feed=rss2&p=3455802 महीने में आ रही नई एनपीएस योजना, प्राइवेट जॉब और बिजनेस करने वालों को भी मिलेगा फायदा
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https://chhattisgarh24x7.in/?p=34556#respondTue, 30 Jun 2026 11:21:38 +0000https://mr-bharat.com/?p=34556साल 2004 से लागू हुई नई पेंशन स्कीम में अभी तक कई बाद बदलाव किए जा चुके हैं. शुरुआत में इस योजना को सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू किया गया था, लेकिन अब इसका दायरा बढ़ाकर प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों तक भी कर दिया गया है. अभी तक देश में करोड़ों कर्मचारियों ने एनपीएस में अपना खाता भी खुलवा लिया है. इन खातों की देखरेख करने वाले पेंशन कोष नियामक एवं विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) ने अगले 2 से ढाई महीने में एक नई एनपीएस योजना लॉन्च करने की बात कही है. आइये समझते हैं कि इसका फायदा किसे और कैसे मिलेगा.
पीएफआरडीए के चेयरमैन एस. रमण ने बताया कि नियामक अगले 60-70 दिन में एनपीएस स्वास्थ्य पेंशन योजना शुरू करेगा. यह योजना स्वास्थ्य बीमा और पेंशन को एक साथ जोड़ने वाला उत्पाद होगी. एनपीएस स्वास्थ्य योजना का उद्देश्य चिकित्सा जरूरतों के लिए एक समर्पित पेंशन खाते की सुविधा उपलब्ध कराना है. इसके साथ एक ‘टॉप-अप’ स्वास्थ्य बीमा भी होगा जिसे पेंशन कोष, एनपीएस अंशधारकों की ओर से उपलब्ध कराएगा. उन्होंने कहा कि पेंशन कोष, टॉप-अप स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराने के लिए बीमा कंपनियों के साथ साझेदारी करेंगे.
हेल्थ इंश्योरेंस के लिए कंपनी भी सेलेक्ट
रमन ने बताया कि इस योजना को हाल ही में निदेशक मंडल की बैठक में मंजूरी मिली है. हम इसे लगभग 60 से 70 दिन में शुरू कर सकेंगे. फिलहाल आदित्य बिड़ला हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को पहले सेवा प्रदाता के रूप में जोड़ा गया है और जल्द ही अन्य कंपनियां भी इस योजना से जुड़ सकती हैं. उन्होंने कहा कि यह योजना एनपीएस के सभी वर्गों के अंशधारकों के लिए उपलब्ध होगी. योजना के तहत लागू शुल्क और प्रभार बहु-योजना ढांचे (एमएसएफ) के तहत होंगे और इन्हें पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक किया जाएगा. इन शुल्कों में स्वास्थ्य लाभ प्रशासक (एचबीए) को देय शुल्क भी शामिल होगा.
]]>https://chhattisgarh24x7.in/?feed=rss2&p=345560म्यूचुअल फंड और शेयर बेचने वालों ध्यान दें, भारी पड़ेगा STCG और LTCG का गलत हिसाब, समझें टैक्स का सीधा गणित
https://chhattisgarh24x7.in/?p=34526
https://chhattisgarh24x7.in/?p=34526#respondMon, 29 Jun 2026 19:12:03 +0000https://mr-bharat.com/?p=34526शेयर बाजार में रिकॉर्ड तेजी के इस दौर में कमाई करना जितना रोमांचक है, टैक्स सीजन आते ही उसका हिसाब-किताब रखना उतना ही पेचीदा हो जाता है. बहुत से निवेशक शेयर या म्यूचुअल फंड बेचकर मुनाफा तो कमा लेते हैं, लेकिन टैक्स लायबिलिटी (कर देनदारी) का सही अंदाजा न होने के कारण वे आखिरी वक्त पर गलती कर बैठते हैं. इनकम टैक्स विभाग के नियमों के तहत, इक्विटी शेयर्स और इक्विटी-ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड्स से होने वाले मुनाफे को होल्डिंग पीरियड (यानी आपने उसे कितने समय तक अपने पास रखा) के आधार पर दो हिस्सों शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स में बांटा जाता है.
इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते समय इस मुनाफे को छुपाना या आम आमदनी के साथ मिला देना आपको भारी मुसीबत में डाल सकता है. सैलरीड क्लास के जो लोग आमतौर पर ITR-1 फाइल करते हैं, वे अगर शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड से कमाई करते हैं, तो उनके लिए ITR-2 फॉर्म भरना अनिवार्य हो जाता है. इस फॉर्म के भीतर कैपिटल गेन्स के लिए एक खास शेड्यूल दिया गया होता है, जहां आपको अपनी हर एक सेल ट्रांजैक्शन और मुनाफे की कूट-कूट कर सटीक जानकारी देनी होती है, ताकि टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से कोई स्क्रूटनी नोटिस न आए.
]]>https://chhattisgarh24x7.in/?feed=rss2&p=345260EMI Vs Rent: किसमें है ज्यादा फायदा? कैलकुलेशन बताएगा सही फैसला
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https://chhattisgarh24x7.in/?p=34502#respondSun, 28 Jun 2026 08:40:20 +0000https://mr-bharat.com/?p=34502क्या हर महीने ईएमआई भरना किराया देने से बेहतर फैसला है? ज्यादातर लोग मानते हैं कि अपना घर खरीदना हमेशा फायदे का सौदा होता है, लेकिन असली तस्वीर तब सामने आती है जब डाउन पेमेंट, ब्याज, मेंटेनेंस और दूसरे छिपे खर्चों का पूरा हिसाब लगाया जाता है. कई मामलों में किराए पर रहना आपकी जेब के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है. जानिए होम लोन की ईएमआई और रेंट में किस ऑप्शन से आपको मिल सकता है ज्यादा फायदा.
जब आप घर खरीदते हैं, तो सिर्फ मकान की कीमत ही नहीं चुकानी होती. इसके अलावा भी कई बड़े खर्चे होते हैं.
वन-टाइम खर्च: रजिस्ट्री, स्टांप ड्यूटी, ब्रोकरेज (दलाली) और घर का इंटीरियर/रिनोवेशन. ये सारे खर्चे मिलकर बजट को अचानक बढ़ा देते हैं.
लगातार होने वाले खर्च: हर महीने जाने वाली भारी-भरकम EMI, प्रॉपर्टी टैक्स, सोसाइटी मेंटेनेंस और इंश्योरेंस. किराया तो तय होता है, लेकिन ये खर्चे समय के साथ बढ़ते रहते हैं.
घर खरीदने में ब्याज और निवेश का नुकसान
घर खरीदने के लिए आपको एक बड़ी रकम ‘डाउन पेमेंट’ के रूप में देनी पड़ती है. यह वो पैसा है जो एक जगह लॉक हो जाता है. अगर आप इसी पैसे को म्यूचुअल फंड, स्टॉक या दूसरी जगह निवेश करते तो आपको शानदार रिटर्न मिल सकता था. इसके अलावा हर महीने मोटी ईएमआई चुकाने के बाद आपके पास अलग से निवेश करने के लिए पैसे बचते ही नहीं हैं.
]]>https://chhattisgarh24x7.in/?feed=rss2&p=345020क्या PM मोदी की अपील का दिखा असर? सोना खरीदने से रुके लोग या बदला बाजार? निवेशकों के लिए क्या संकेत
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https://chhattisgarh24x7.in/?p=34500#respondSun, 28 Jun 2026 08:38:49 +0000https://mr-bharat.com/?p=34500पिछले कुछ सप्ताह में सोने और चांदी की कीमतों में अच्छी-खासी गिरावट देखने को मिली है. 10 मई को 24 कैरेट सोने की कीमत करीब 1,53,140 रुपये प्रति 10 ग्राम थी, जो 28 जून तक घटकर लगभग 1,39,873 रुपये रह गई. यानी सोना करीब 13,267 रुपये सस्ता हो गया. इसी तरह चांदी की कीमत भी करीब 2,62,350 रुपये प्रति किलोग्राम से गिरकर 2,16,541 रुपये पर आ गई. इसका मतलब है कि चांदी करीब 45,809 रुपये प्रति किलो तक सस्ती हुई है. कीमतों में यह गिरावट निवेशकों और खरीदारों दोनों के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है.
PM मोदी ने क्यों की थी अपील?
10 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से अपील की थी कि वे एक साल तक गैर-जरूरी खर्चों को टालें. उन्होंने खास तौर पर सोना खरीदने और विदेश घूमने जैसी चीजों पर फिलहाल खर्च न करने की सलाह दी थी. उनका कहना था कि इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत रहेगा और डॉलर की जरूरत कम होगी. साथ ही बढ़ते आयात बिल पर भी नियंत्रण रखा जा सकेगा. उस समय पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को देखते हुए सरकार विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करना चाहती थी.
भारत में सोने का आयात क्यों है अहम?
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है. देश में सोने की मांग का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करके पूरा किया जाता है. जब सोने का आयात बढ़ता है तो बड़ी मात्रा में डॉलर विदेश भेजना पड़ता है. इससे व्यापार घाटा बढ़ सकता है और रुपये पर भी दबाव आता है. यही कारण है कि सरकार लंबे समय से सोने के आयात को संतुलित रखने की कोशिश करती रही है. यदि लोग कम सोना खरीदते हैं तो आयात घट सकता है और विदेशी मुद्रा की बचत भी हो सकती है.