
फसलों में बीमारी, कीट और पर्यावरणीय प्रभावों की शीघ्र पहचान की जा सकेगी। इससे जल का कुशल उपयोग, जल संरक्षण में वृद्धि और सिंचाई लागत में कमी आएगी। ड्रोन से कृषि उत्पादकता और फसलों की गुणवत्ता में सुधार होगा। किसानों को ड्रोन प्रौद्योगिकी से नई कृषि पद्धतियों का लाभ मिलेगा।
]]>ऑल इंडिया रेडियो के लेक्चर में उन्होंने बहु प्रतीक्षित भारत के गगनयान मिशन के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि मानवयुक्त स्पेस मिशन गगनयान संभवतः 2026 में लॉन्च होगा. वहीं, चंद्रयान-4 जो कि चांद की सतह से सैंपल लेकर आएगा, यह 2028 तक लॉन्च हो सकता है. वहीं, उन्होंने बताया कि भारत-अमेरिका का विलंबित मिशन निसार अगले साल तक संभव हो सकेगा. निसार मिशन, एक रडार मशीन है जो धरती की सतह पर पर्यावरणीय बदलावों और प्राकृतिक आपदाओं और प्राकृतिक घटनाओं की बेहतर जानकारी जुटाएगा.
JAXA के साथ ISRO का मून मिशन
इसरो के अध्यक्ष ने खुलासा किया कि जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जेएक्सए (JAXA) के साथ संयुक्त चंद्रमा-लैंडिंग मिशन, जिसे मूल रूप से ल्यूपेक्स या लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन (LUPEX) नाम दिया गया था. यह चंद्रयान-5 मिशन होगा. उन्होंने लॉन्च के लिए फिक्स समय सीमा का उल्लेख नहीं किया. पहले LUPEX मिशन को 2025 की समय-सीमा में लॉन्च किया जाना था, लेकिन अब इसे चंद्रयान-5 के रूप में वर्णित किया गया है, इसलिए इसकी उम्मीद 2028 के बाद ही की जा सकती है.
चंद्रयान-4 कब तक
सोमनाथ ने बताया, ‘चंद्रयान-4 एक बहुत भारी मिशन होगा, इसमें लैंडर भारत द्वारा प्रदान किया जाएगा, जबकि रोवर जापान से आएगा. चंद्रयान-3 पर रोवर का वजन केवल 27 किलोग्राम था. लेकिन, यह मिशन 350 किलोग्राम का रोवर ले जाएगा. यह मिशन भारत को चंद्रमा पर मानव को उतारने में एक कदम और करीब ले जाएगा. उन्होंने भारत ने 2040 तक चंद्रमा पर मानवयुक्त मिशन भेजने की योजना का अनावरण किया है.
इसरो में प्राइवेट सेक्टर
सोमनाथ ने शनिवार के लेक्चर में वैश्विक स्पेस इकॉनमी और स्पेस रिसर्च में प्राइवेट सेक्टर को शामिल करने को लेकर बात की. उन्होंने बताया कि अगले 10 से 12 साल में इंटरनेशनल स्पेस इकॉनमी में भारत की भागीदारी 2 प्रतिशत से 10 प्रतिशत तक करने की कोशिश किया जाएगा. उन्होंने बताया कि इसे इसरो अकेले दम पर हासिल नहीं कर सकता है. स्टार्ट-अप से लेकर बड़ी कंपनियों तक, सभी को भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में आकर भाग लेने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा, “हम ऐसे सक्षम तंत्र बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं, जिससे कंपनियों के लिए इसरो के साथ काम करना आसान हो जाएगा.”
मौजूदा सामय 10 हजार से अधिक ट्रेनें पूरे देश में चल रही हैं. इसमें वंदेभारत, शताब्दी, राजधानी से लेकर मेल एक्सप्रेस, पैसेंजर, लोकल, ईएमयू और डीएमयू शामिल हैं. मेल एक्सप्रेस की संख्या करीब 822 है. इन सभी ट्रेनों में चार-चार कोच जनरल के लगाए जा रहे हैं. दो आगे और दो पीछे कोच लगेंगे.
अभी तक संख्या तय नहीं थी
अभी तक-मेल एक्सप्रेस में जनरल कोचों की संख्य तय नहीं थी. किसी में एक, किसी में दो, किसी में तीन तो किसी में चार कोच लगते थे. यह कोचों की उपलब्धता पर निर्भर करता था. इसी वजह से जिस ट्रेनों में जनरल कोचों की संख्य कम होती है, उन ट्रेनों के जनरल कोचों में घुसने के लिए मारामारी होती थी. यात्रियों को लटकर यात्रा करनी पड़ती है. कोच में घुस न पाने की वजह से कई बार ये यात्री स्लीपर कोच में घुसकर मजबूरी में सफर करते थे.
1300 कोच लगाने की जरूरत
रेल मंत्रालय के अनुसार सभी मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों में कुल मिलाकर 1300 कोचों की जरूरत पड़ेगी. इन कोचों का निर्माण तेजी से किया जा रहा है. जैसे-जैसे कोच बनते जा रहे हैं, ट्रेनों में लगाए जा रहे हैं. अभी तक 120 ट्रेनों में चार-चार कोच लगाए जा चुके हैं.
2000 कोचों का निर्माण मार्च तक
भारतीय रेलवे कुल 2000 जनरल कोचों का निर्माण मार्च 2024 तक करेगा. इनमें से 1300 कोच लगने के बाद के बाद बचे हुए 700 कोचों को पुराने कोचों से रिप्लेस किया जाएगा. इस तरह जनरल कोचों में लोगों को धक्का मुक्की करके सफर करने की जरूरत नहीं होगी.
]]>बीटेक में कई ब्रांच होती हैं. करियर प्रॉस्पेक्ट और अपनी रुचि को ध्यान में रखते हुए बेस्ट इंजीनियरिंग कोर्स चुनना चाहिए. केमिकल इंजीनियरिंग, मेकैनिकल इंजीनियरिंग, सिविल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, पेट्रोलियम इंजीनियरिंग.. बीटेक की किसी भी ब्रांच में एडमिशन लेने से पहले टॉप इंजीनियरिंग कॉलेज की जानकारी भी जुटा लें (Top Engineering College). जानिए किन देशों में बीटेक की पढ़ाई सबसे सस्ती है. यहां कम फीस में अपना सपना पूरा कर सकते हैं.
1. भारत: भारत में इंजीनियरिंग की पढ़ाई बहुत सस्ती है. यहां स्थित मान्यता प्राप्त सरकारी और प्राइवेट संस्थानों में एडमिशन हासिल करने के लिए जेईई या समकक्ष एंट्रेंस एग्जाम पास करना जरूरी है.
2. चीन: चीन में बीटेक कोर्स की फीस कम है (Cheapest Engineering College). यहां की कई यूनिवर्सिटी विश्व स्तरीय हैं. चीन में एमबीबीएस की फीस भी कम है.
3. रूस: विदेश से पढ़ाई करने के इच्छुक स्टूडेंट्स रशिया यानी रूस के एमबीबीएस और बीटेक कॉलेज में एडमिशन लेते हैं. रूस में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की फीस कम है.
4. जर्मनी: जर्मनी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई लगभग फ्री है (Engineering Course Fees). यहां के कई विश्वविद्यालय विश्व स्तरीय हैं. यहां एडमिशन मिलना भी आसान है.
5. पोलैंड: पोलैंड में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कम फीस में की जा सकती है. किसी भी विदेशी यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने से पहले उसकी रैंकिंग जरूर चेक कर लें.
6. हंगरी: हंगरी में स्थित बीटेक कोर्स में एडमिशन हासिल करने के लिए वहां की यूनिवर्सिटीज की रैंकिंग देख लें (BTech Fees). यहां की फीस भी कम है.
7. तुर्की: बड़ी संख्या में भारतीय स्टूडेंट्स मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए तुर्की जाते हैं. तुर्की में कम फीस में बीटेक कोर्स किया जा सकता है.
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8. मेक्सिको: मेक्सिको के विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय में एडमिशन लेकर विदेशी यूनिवर्सिटी से बीटेक करने का सपना साकार कर सकते हैं.
9. ब्राजील: ब्राजील भी कम फीस वाले इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए मशहूर है. यहां एडमिशन हासिल करने के लिए कॉलेज शॉर्टलिस्ट करने के बाद उसकी रैंकिंग देख सकते हैं.
10. दक्षिण अफ्रीका: दक्षिण अफ्रीका के बीटेक कॉलेज में भी कम फीस में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर सकते हैं.
]]>मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेन का निर्माण BEML के बेंगलुरु स्थित प्लांट में किया जाएगा. इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, चेन्नई के महाप्रबंधक यू सुब्बा राव ने बताया कि केवल BEML ने दो आठ-कार ट्रेन सेट बनाने के लिए बोली प्रस्तुत की है, और टेंडर को एक सप्ताह में अंतिम रूप दे दिया जाएगा. चूंकि यह केवल दो ट्रेनों के लिए एक छोटा ऑर्डर है, इसलिए अन्य रोलिंग स्टॉक निर्माता भाग लेने के लिए उत्सुक नहीं थे. हमारा लक्ष्य 2.5 वर्षों में निर्माण कार्य को पूरा करना है.”
250 करोड़ रुपये में बनेंगी ट्रेनें
BEML-मेधा सर्वो ड्राइव्स ने ट्रेनों को बनाने में सटीक राशि स्पष्ट नहीं है, लेकिन अनुमान है कि एक ट्रेन को बनाने में कुल खर्च 200-250 करोड़ रुपये हो सकता है. ये ट्रेनें मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) कॉरिडोर पर चलेंगी, जिसे नेशनल हाई-स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) द्वारा विकसित किया जा रहा है.
शुरुआत में इस लाइन पर जापानी शिंकानसेन ट्रेनें (320 किलोमीटर प्रति घंटे की परिचालन गति) चलने की उम्मीद थी. हालांकि, जापानी फर्मों द्वारा बीडिंग में अधिक कीमत के कारण, केंद्रीय रेल मंत्रालय ने घरेलू स्तर पर हाई-स्पीड ट्रेनें विकसित करने का फैसला किया.
यूरोपियन लेवल के होंगे कोच
एक अधिकारी ने कहा, “बीईएमएल की कारबॉडी निर्माण विशेषज्ञता और मेधा की प्रोपल्शन क्षमताओं के साथ, यूरोपीय मानकों को पूरा करने वाली एक स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेन बनाई जा सकती है. मेधा अपनी प्रोपल्शन प्रणाली को पहले से ही वंदे भारत ट्रेनों के जरिए साबित कर चुकी है, जो अधिकतम 160 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलती हैं.”
मेधा अब 250 किलोमीटर प्रति घंटे की क्षमता वाली प्रोपल्शन तकनीक विकसित करेगी, जबकि बीईएमएल ऐसी गति को झेलने के लिए कारबॉडी संरचना विकसित करेगी. बीईएमएल-मेधा द्वारा इस परियोजना के लिए एक यूरोपीय डिजाइन सलाहकार को नियुक्त करने की उम्मीद है.
280 किलोमीटर प्रति घंटे की डिज़ाइन गति और 250 किलोमीटर प्रति घंटे की परिचालन गति वाली पहली ट्रेन दिसंबर 2026 तक शुरू होने की उम्मीद है, जिसका परीक्षण MAHSR लाइन के सूरत-बिलिमोरा खंड पर किया जाएगा.
भारत से निर्यात का भी है प्लान
ट्रेन में मानक 3+2 सीटिंग व्यवस्था वाली सात बोगियां और 2+2 सीटिंग वाली एक कार्यकारी बोगी होगी. सूत्रों के मुताबिक, “कुल बैठने की क्षमता लगभग 174 होने की उम्मीद है. यात्रियों की मांग के आधार पर, भविष्य में ट्रेन में 12 या 16 बोगियां और जोड़ी जा सकती हैं. दक्षिण पूर्व एशिया और अफ्रीका जैसे निर्यात बाजारों पर नजर रखते हुए, ट्रेनों को मानक गेज ट्रैक के लिए बनाया जाएगा.”
मेधा अपनी हैदराबाद सुविधा से प्रोपल्शन सिस्टम का निर्माण और ट्रेन कंट्रोल मैनेजमेंट सिस्टम (TCMS) सॉफ़्टवेयर विकसित करेगी. BEML अपने बेंगलुरु कारखाने से अंतिम असेंबली और रोलआउट का काम संभालेगी. अधिकारी ने कहा, “सफल परीक्षणों के बाद, मुंबई-अहमदाबाद मार्ग और अन्य आगामी हाई-स्पीड रेल लाइनों, जैसे दिल्ली-वाराणसी, मुंबई-हैदराबाद और बेंगलुरु-चेन्नई के लिए अतिरिक्त ऑर्डर मिलने की संभावना है.”
वॉल्यूम चेक करें- सबसे पहले तो ये देख लें कि वॉल्यूम सबसे कम नंबर पर सेट न हो. आप अपने फोन पर वॉल्यूम बटन दबाकर या अपने फोन की सेटिंग में जाकर वॉल्यूम एडजस्ट कर सकते हैं.
स्पीकर साफ करें- आपके फोन के स्पीकर पर धूल और गंदगी जमा हो सकती है, और ये साउंड की क्वालिटी को प्रभावित कर सकता है. किसी भी जमी हुई गंदगी को हटाने के लिए स्पीकर को आराम से साफ करें.
अपने फोन को रिस्टार्ट करें- अपने फोन को रिस्टार्ट करने से बैकग्राउंड प्रोग्राम प्रोसेसिंग जैसी छोटी-मोटी समस्याएं ठीक हो सकती हैं, जो कम साउंड का कारण बन सकती हैं.
डू नॉट डिस्टर्ब मोड ऑफ करें- डू नॉट डिस्टर्ब मोड आपके फोन के साउंड को प्रभावित कर सकती है. इसलिए चेक कर लें कि कहीं ये ऑन तो नहीं.
ब्लूटूथ बंद करें- ब्लूटूथ आपके फोन के साउंड को प्रभावित कर सकता है. इसलिए इसे ऑफ करने के बाद साउंड को चेक करना चाहिए.
ऐप की मदद से- अगर आपको लगता है सारे उपाय के बाद भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा है तो आप अलग से वॉल्यूम ऐप डाउनलोड कर सकते हैं. इसके लिए जब आप गूगल प्ले स्टोर में Volume Booster सर्च करेंगे तो आपके सामने कई ऑप्शन आ जाएंगे. कोई भी एक ऐप का इस्तेमाल करके स्पीकर की आवाज़ बढ़ा सकते हैं.
ये है आखिरी रास्ता
फैक्टरी रीसेट करें- इन सबके बावजूद अगर आपको अभी भी परेशानी हो रही है, तो आप फैक्टरी रीसेट करने की कोशिश कर सकते हैं, जो सभी डेटा मिटा देगा और आपके फोन को उसकी मेन सेटिंग्स पर वापस कर देगा. ऐसा करने से पहले अपने डेटा का बैकअप लेना सुनिश्चित करें, क्योंकि इस सेटिंग से फोन का सारा डेटा खत्म हो जाएगा.
बीटेक का फुल फॉर्म बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी इन इंजीनियरिंग है (BTech Full Form). यह कोर्स 4 सालों का होता है. बीटेक के फाइनल ईयर में कैंपस प्लेसमेंट से अच्छी नौकरी हासिल कर सकते हैं (High Paying Jobs). कई स्टूडेंट्स को खुद अपनी मेहनत से भी नौकरी मिल जाती है. वहीं, कुछ बीटेक के बाद एमटेक करते हैं, कुछ एमबीए और कुछ सरकारी नौकरी की तैयारी में जुट जाते हैं. हर साल बड़ी संख्या में इंजीनियर्स यूपीएससी सिविल सर्विस परीक्षा पास करते हैं.
विदेश में नौकरी के लिए परफेक्ट हैं बीटेक की ये ब्रांच
बीटेक कई स्ट्रीम्स में होता है (BTech Branches Ranking). लेकिन हर स्ट्रीम आपको विदेश का टिकट नहीं दिलवा सकती है. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, फ्लिपकार्ट, एमेजॉन, विप्रो जैसी कई कंपनियां ग्लोबल प्लेसमेंट के लिए जानी जाती हैं (High Paying Jobs). MSM Unify के सीईओ राघवा गोपाल से जानिए बीटेक की टॉप ब्रांच, जिनसे विदेश में नौकरी मिल सकती है-
1. कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग (Computer Science Engineering)
जरूरी स्किल्स: एआई, मशीन लर्निंग, साइबरसिक्योरिटी और डेटा साइंस में स्पेशलाइजेशन करने से ग्लोबल जॉब मिलना आसान हो जाता है.
कहां मिलेगी नौकरी: यूएसए, कनाडा, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को टेक इनोवेशन का मेजर हब माना जाता है. कंप्यूटर साइंस इंजीनियर यहां आसानी से नौकरी ढूंढ सकते हैं.
वर्क फ्रॉम होम: कोरोना काल के बाद से कई इंटरनेशनल कंपनियां अपने एंप्लॉइज को होम कंट्री यानी जिस देश से वो हैं, वहीं से काम करने की अनुमति देती हैं.
2. मेकैनिकल इंजीनियरिंग (Mechanical Engineering)
कहां है जरूरत: ऑटोमोटिव, एयरोस्पेस, मैन्युफैक्चरिंग और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में मेकैनिकल इंजीनियर्स की काफी डिमांड है.
जॉब मार्केट: मेकैनिकल इंजीनियर जर्मनी, जापान और साउथ कोरिया जैसे देशों में आसानी से अच्छे पैकेज वाली नौकरी ढूंढ सकते हैं.
जरूरी स्किल्स: 3डी प्रिंटिंग, नैनोटेक्नोलॉजी और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में स्पेशलाइजेशन करके विदेश में बेहतरीन पैकेज वाली नौकरी हासिल कर सकते हैं.
3. सिविल इंजीनियरिंग (Civil Engineering)
इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट: यूएई, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का इंफ्रास्ट्रक्चर लगातार डेवलप हो रहा है. ऐसे में यहां सिविल इंजीनियर्स की काफी डिमांड है.
ग्रीन इंजीनियरिंग: यूरोप और नॉर्थ अमेरिका इको-कॉन्शियस क्षेत्र हैं. यहां नौकरी करने के लिए सस्टेनेबल एंड एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग में स्पेशलाइजेशन करना अच्छा ऑप्शन है.
ग्लोबल प्रोजेक्ट: सिविल इंजीनियर अक्सर इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स पर काम करते हैं. इससे उन्हें कई तरह के एनवायरमेंट और कटिंग Edge टेक्नोलॉजी का एक्सपोजर मिलता है.
4. इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग (Electrical Engineering)
विदेश में खूब हैं अवसर: यूएसए, जर्मनी और मिडिल ईस्ट जैसे देशों में पावर जनरेशन, टेलीकम्युनिकेशंस और इलेक्ट्रॉनिक्स आदि क्षेत्रों में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स की काफी डिमांड है.
एनर्जी सेक्टर: रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी में स्पेशलाइजेशन करके सस्टेनेबिलिटी पर फोकस करने वाले देशों में आसानी से नौकरी मिल सकती है.
ग्लोबल इनोवेशन: जापान और साउथ कोरिया जैसे देश कटिंग एज कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन जैसे क्षेत्रों में जॉब ऑफर करते हैं.
5. केमिकल इंजीनियरिंग (Chemical Engineering)
विदेश में हैं खूब अवसर: फार्मास्यूटिकल्स, पेट्रोकेमिकल्स और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में केमिकल इंजीनियर्स की काफी डिमांड है. इन्हें सऊदी अरब, यूएसए और सिंगापुर में नौकरी मिल सकती है.
सस्टेनेबिलिटी पर फोकस: ग्रीन टेक्नोलॉजी या एनवायर्मेंटल इंजीनियरिंग में स्पेशलाइजेशन करके ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी गोल्स की डिमांड पर फोकस कर सकते हैं.
रिसर्च एंड डेवलपमेंट: स्विट्जरलैंड और जर्मनी जैसे देश केमिकल इंजीनियर्स को रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए काफी अवसर देते हैं.
6. एयरोस्पेस इंजीनियरिंग (Aerospace Engineering)
एविएशन एंड स्पेस एक्सप्लोरेशन: यूएसए, फ्रांस और यूके में एयरोस्पेस इंडस्ट्री की भरमार है. ऐसे में यहां एयरोस्पेस इंजीनियर की डिमांड भी ज्यादा रहती है.
डिफेंस एंड टेक्नोलॉजी: डिफेंस टेक्नोलॉजी या अनमैन्ड एरियल सिस्टम में स्पेशलाइजेशन करने से एमएमसी और सरकारी एजेंसी में नौकरी मिल सकती है.
भविष्य में बढ़ेगी डिमांड: स्पेस एक्सप्लोरेशन, ड्रोन टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रिक एयरक्राफ्ट में होने वाला विस्तार एयरोस्पेस इंजीनियर्स के लिए नौकरी के नए अवसर शुरू कर रहा है.
7. एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग (Environmental Engineering)
सस्टेनेबल सॉल्यूशन: क्लाइमेट चेंज को लेकर बढ़ रही सजगता से नीदरलैंड, कनाडा और स्कैनडिनेवियन जैसे देशों में पर्यावरण इंजीनियर की काफी डिमांड है.
रिन्यूएबल एनर्जी: रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम या वॉटर रिसोर्स मैनेजमेंट में स्पेशलाइजेशन करके कई देशों में नौकरी मिल सकती है.
ग्लोबल पॉलिसी कंप्लायंस: इंटरनेशनल एनवायरमेंटल रेगुलेशन और सस्टेनेबिलिटी से मल्टीनेशनल ऑर्गनाइजेशन में अच्छे पैकेज वाली नौकरी मिल सकती है.