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रेलवे पेटी ठेकेदार अमन अग्रवाल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल, भुगतान विवाद से रायपुर रेलवे डिवीजन की साख पर गहरा असर; अब अधिकारियों की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल

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रायपुर। रायपुर रेलवे डिवीजन अंतर्गत भाटापारा, बिल्हा समेत विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर कराए गए HPL शीट कार्यों को लेकर भुगतान विवाद अब गंभीर रूप लेता जा रहा है। इस पूरे मामले में पेटी ठेकेदार अमन अग्रवाल की कार्यप्रणाली को लेकर ठेकेदारों, वेंडरों और कामगारों की ओर से गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि कार्य पूरा होने के बाद भुगतान के समय अलग-अलग तकनीकी आपत्तियों का हवाला देकर शेष राशि रोक दी गई।

कैसे आगे बढ़ा HPL कार्य का ठेका?

जानकारी के अनुसार, उक्त HPL शीट कार्य मेसर्स सुरेश अग्रवाल फर्म को अलॉट किया गया था। इसके अधीन यह कार्य पेटी कॉन्ट्रैक्ट के माध्यम से श्रद्धा कंस्ट्रक्शन को दिया गया था। इसके बाद श्रद्धा कंस्ट्रक्शन की ओर से अमन अग्रवाल द्वारा कार्यों को अलग-अलग हिस्सों में विभाजित कर अन्य पेटी ठेकेदारों एवं एजेंसियों को सौंपे जाने की बात सामने आई है।
इसी कार्य श्रृंखला के तहत Sai Buildcom को भी श्रद्धा कंस्ट्रक्शन के माध्यम से पेटी स्तर पर HPL कार्य सौंपा गया था। Sai Buildcom के संचालक एवं वरिष्ठ पत्रकार सौरभ दुल्हानी का आरोप है कि उनकी ओर से निर्धारित कार्य पूरा किया गया तथा रेलवे अधिकारियों द्वारा बताई गई तकनीकी कमियों का भी निर्देशानुसार सुधार कर दिया गया। इसके बावजूद शेष भुगतान लंबित है।

काम पूरा, सुधार भी हुआ, फिर भुगतान क्यों लंबित?

मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब रेलवे की ओर से बताई गई तकनीकी कमियों का सुधार कर दिया गया, तो भुगतान अब तक क्यों रोका गया है?
ठेकेदार पक्ष का आरोप है कि कार्य पूरा होने के बाद भुगतान को लेकर अलग-अलग तकनीकी कारण बताए जाते रहे। उनका कहना है कि यदि किसी कार्य में कमी थी तो उसे सुधारने के निर्देश दिए गए और निर्देशानुसार सुधार भी किया गया, तो सुधार के बाद भुगतान की प्रक्रिया आगे क्यों नहीं बढ़ी—यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।

बड़ा सवाल—भुगतान पहले, अंतिम निरीक्षण बाद में?

इस पूरे मामले में एक और गंभीर सवाल सामने आ रहा है। सूत्रों के अनुसार कार्य की प्रगति के दौरान संबंधित फर्म को HPL शीट कार्य का भुगतान कर दिया गया था, जबकि अंतिम निरीक्षण और तकनीकी सत्यापन बाद में हुआ।
यदि यह बात रिकॉर्ड से पुष्ट होती है तो मामला केवल पेटी ठेकेदार की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं रहेगा। सवाल यह भी उठेगा कि क्या अंतिम निरीक्षण से पहले ही भुगतान कर दिया गया था? यदि हां, तो भुगतान किस स्तर पर स्वीकृत हुआ और उस समय कार्य का तकनीकी सत्यापन किस आधार पर किया गया?
यदि रिकॉर्ड में अंतिम निरीक्षण से पहले भुगतान की पुष्टि होती है, तो भुगतान प्रक्रिया में शामिल संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर भुगतान किस स्तर पर स्वीकृत हुआ, किन दस्तावेजों के आधार पर हुआ और उस समय कार्य की तकनीकी स्थिति का सत्यापन किस अधिकारी द्वारा किया गया—इन सवालों के जवाब संबंधित रिकॉर्ड से ही सामने आएंगे।

HPL वेंडर अंकित गुप्ता ने भी उठाए सवाल

HPL शीट से जुड़े वेंडर अंकित गुप्ता द्वारा भी भुगतान को लेकर गंभीर शिकायत किए जाने की जानकारी सामने आई है। आरोप है कि कार्य से संबंधित भुगतान लंबित होने के कारण उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
बताया जा रहा है कि अंकित गुप्ता ने भुगतान विवाद का समाधान नहीं होने की स्थिति में FIR सहित कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। यदि मामला कानूनी स्तर तक पहुंचता है तो भुगतान और कार्य से जुड़े दस्तावेज भी जांच के दायरे में आ सकते हैं।

मजदूरों की मजदूरी का मुद्दा भी सामने

विवाद केवल ठेकेदारों और वेंडरों तक सीमित होने का आरोप नहीं है। कुछ कामगारों की मजदूरी भी लंबित होने की बात सामने आई है। भुगतान को लेकर हुई बातचीत की कॉल रिकॉर्डिंग उपलब्ध होने का दावा किया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि भुगतान नहीं होने से नाराज कुछ कामगार प्रदर्शन की तैयारी में हैं। यदि ऐसा होता है तो रेलवे के कार्यों से जुड़े भुगतान विवाद का असर जमीनी स्तर पर भी दिखाई दे सकता है।

रायपुर रेलवे डिवीजन की साख पर उठ रहे सवाल

रेलवे के काम से जुड़े निजी ठेकेदारों, पेटी ठेकेदारों, वेंडरों और श्रमिकों के बीच भुगतान विवाद अब रायपुर रेलवे डिवीजन की कार्यप्रणाली और साख से जोड़कर देखा जा रहा है।
सवाल यह है कि भाटापारा, बिल्हा समेत अन्य स्टेशनों पर कराए गए HPL कार्यों में भुगतान की पूरी प्रक्रिया क्या थी? अंतिम निरीक्षण कब हुआ? तकनीकी आपत्तियां क्या थीं? उनका सुधार कब किया गया? और सुधार के बाद भी संबंधित ठेकेदारों एवं वेंडरों का भुगतान क्यों लंबित है?
यदि अंतिम निरीक्षण से पहले भुगतान किए जाने की बात रिकॉर्ड से पुष्ट होती है, तो भुगतान प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के दायरे में आ सकती है। भुगतान की स्वीकृति किस स्तर पर हुई और उस समय कौन-कौन से तकनीकी दस्तावेज उपलब्ध थे, यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न होंगे।

अब रेल मंत्री तक मामला पहुंचाने की तैयारी

बताया जा रहा है कि रेल मंत्री के प्रस्तावित रायपुर प्रवास के दौरान प्रभावित पक्ष इस पूरे मामले को उनके संज्ञान में लाने की तैयारी कर रहे हैं। संबंधित पक्षों द्वारा वर्क ऑर्डर, भुगतान का विवरण, शिकायतें, निरीक्षण संबंधी जानकारी और उपलब्ध अन्य रिकॉर्ड प्रस्तुत किए जाने की बात कही जा रही है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रेलवे प्रशासन इस पूरे मामले में क्या स्थिति स्पष्ट करता है और भुगतान, तकनीकी निरीक्षण तथा संबंधित ठेकेदारों की भूमिका को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं।

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