12.39 मीटर पानी पहुंचने के बाद रेस्क्यू की तस्वीरें तो सामने आ गईं, अब यह भी बताइए—खतरे की घंटी बजने से पहले जनता को किसने जगाया?
संपादकीय | सौरभ दुलहानी
इंद्रावती इस बार सिर्फ अपने किनारे नहीं लांघी, उसने व्यवस्था के कई दावों की सीमाएं भी उजागर कर दीं।
जगदलपुर और बस्तर ने बाढ़ का वह मंजर देखा, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। नदी का जलस्तर 12 मीटर के पार गया, खतरे के निशान 8.30 मीटर से कई मीटर ऊपर पहुंचा, घरों में पानी घुसा, लोग छतों पर पहुंचे और अंततः डोंगाघाट में फंसे लोगों को निकालने के लिए भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर तक की मदद लेनी पड़ी।
बेशक, इस कठिन समय में प्रशासन, पुलिस, एसडीआरएफ, सुरक्षाबलों और स्थानीय स्वयंसेवकों ने राहत एवं बचाव में काम किया। जिन जवानों और कर्मचारियों ने अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों को सुरक्षित निकाला, उनके प्रयासों की सराहना होनी चाहिए।
लेकिन संपादकीय का सवाल राहत दलों से नहीं है।
सवाल उस व्यवस्था से है, जिसकी जिम्मेदारी सिर्फ लोगों को डूबने के बाद बचाना नहीं, बल्कि उन्हें डूबने की नौबत आने से पहले चेताना भी है।
और यही वह सवाल है जिससे बचा नहीं जा सकता।
जब खतरा पहले से दिख रहा था, तो चेतावनी कितनी दूर तक पहुंची?
24 सितंबर को ही प्रशासन की ओर से इंद्रावती के बढ़ते जलस्तर को लेकर चेतावनी की खबर सामने आई थी। संभावित रूप से प्रभावित 43 गांवों को चिन्हित करने, कोटवारों के माध्यम से मुनादी कराने और एसडीआरएफ को अलर्ट करने की बात कही गई थी।
यानी खतरे के संकेत मौजूद थे।
फिर सवाल और गंभीर हो जाता है—
क्या चेतावनी सिर्फ सरकारी फाइलों, बैठकों और अधिकारियों के निर्देशों तक सीमित रह गई या वह हर उस घर तक पहुंची, जहां अगली रात पानी घुसने वाला था?
क्योंकि आपदा प्रबंधन का मतलब केवल यह नहीं कि पानी आ गया तो नाव भेज दी जाए।
आपदा प्रबंधन का असली अर्थ है—
पानी आने से पहले लोगों को बता देना कि पानी आने वाला है।
उन्हें यह बता देना कि किस समय घर छोड़ना है, कहां जाना है, किस रास्ते जाना है और वहां पहुंचने के बाद कहां रहना है।
रेस्क्यू की संख्या उपलब्धि है या चेतावनी?
आज प्रशासन यह बताता है कि कितने लोगों को सुरक्षित निकाला गया, कितने राहत शिविर बनाए गए और कितने लोगों को वहां ठहराया गया।
ये आंकड़े जरूरी हैं।
लेकिन हर आंकड़े के पीछे एक सवाल भी छिपा है।
अगर सैकड़ों-हजारों लोगों को अपना घर छोड़कर राहत शिविरों में जाना पड़ा, तो कितनों को यह सूचना समय रहते मिल गई थी कि उन्हें घर छोड़ना है?
और अगर कुछ लोग इतने गंभीर रूप से फंस गए कि उन्हें हेलीकॉप्टर से निकालना पड़ा, तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि उन लोगों तक निकासी की व्यवस्था पहले क्यों नहीं पहुंची?
डोंगाघाट में भारतीय वायुसेना के एमआई-17 से लोगों को एयरलिफ्ट करना निश्चित रूप से राहत एवं बचाव क्षमता का उदाहरण है। लेकिन यह दृश्य हमें एक दूसरा सवाल भी देता है—
क्या प्रशासन की सबसे बड़ी सफलता यह होनी चाहिए कि वह लोगों को छत से हेलीकॉप्टर में बैठाकर बचाए, या यह कि लोगों को छत तक पहुंचने ही न दे?
यही फर्क है राहत और आपदा प्रबंधन में।
बाढ़ अचानक हो सकती है, लेकिन खतरा अचानक पैदा नहीं होता
बारिश अचानक तेज हो सकती है।
नदी अचानक उफान पर आ सकती है।
लेकिन नदी के बढ़ते जलस्तर, ऊपरी क्षेत्रों की बारिश, बांधों से छोड़ा गया पानी और निचले इलाकों की भौगोलिक स्थिति—ये सब संकेत हैं।
इन संकेतों को पढ़ना ही प्रशासनिक तंत्र का काम है।
जब 24 सितंबर को ही संभावित प्रभावित गांवों की सूची तैयार थी और अलर्ट की बात सामने आ चुकी थी, तब अब यह समीक्षा होनी चाहिए कि उस चेतावनी की जमीनी पहुंच कितनी थी।
कागज पर अलर्ट और जमीन पर अलर्ट में बहुत अंतर होता है।
कागज पर लिखा हुआ संदेश किसी परिवार को नहीं बचाता।
दरवाजे पर पहुंची सूचना बचाती है।
समाज आगे नहीं आता तो तस्वीर और भयावह होती
इस बाढ़ के बीच जगदलपुर के सामाजिक संगठनों, विभिन्न समाजों, समाज प्रमुखों और स्वयंसेवकों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जहां सरकारी व्यवस्था अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर रही थी, वहीं समाज ने भी अपने स्तर पर भोजन, पानी, राहत सामग्री, नाव, वाहन और मानवबल के साथ मोर्चा संभाला।
यह बस्तर की सामाजिक ताकत है।
लेकिन यहां भी एक सवाल है—
क्या हर आपदा में प्रशासन को समाज की ताकत का सहारा लेकर अपनी कमियों की भरपाई करनी चाहिए, या समाज की भागीदारी को प्रशासनिक तैयारी का पूरक बनाकर एक ऐसी व्यवस्था तैयार करनी चाहिए जिसमें संकट आने से पहले ही हर संवेदनशील परिवार तक मदद पहुंचने की योजना तैयार हो?
समाज संकट में खड़ा होता है—यह हमारी ताकत है।
लेकिन इसे सरकारी तैयारी का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
अब पानी उतरेगा, तस्वीरें बदलेंगी… लेकिन सवाल नहीं
बाढ़ का पानी धीरे-धीरे उतर जाएगा।
राहत शिविर खाली हो जाएंगे।
लोग अपने घर लौटेंगे।
सड़कें फिर चलने लगेंगी।
कुछ दिनों बाद बाढ़ की तस्वीरें भी अखबारों के पुराने पन्नों में चली जाएंगी।
लेकिन उन परिवारों के सवाल वहीं रहेंगे, जिनके घर में पानी घुसा।
उन किसानों के सवाल रहेंगे, जिनकी फसल गई।
उन व्यापारियों के सवाल रहेंगे, जिनका सामान बर्बाद हुआ।
और सबसे बड़ा सवाल रहेगा—
जब खतरा दिखाई दे रहा था, तब क्या लोगों को उतनी ही तेजी से चेताया गया था, जितनी तेजी से बाद में उन्हें बचाने के लिए टीमें भेजी गईं?
प्रशासन को अब केवल यह बताने से आगे जाना होगा कि कितने लोगों को बचाया गया।
उसे यह भी बताना होगा—
कितने लोगों को पहले चेताया गया था?
कितने परिवारों को पहले ही निकाला गया था?
किस इलाके में सूचना देर से पहुंची?
कहां संचार व्यवस्था कमजोर रही?
और अगली बार ऐसी स्थिति आने से पहले क्या बदलेगा?
क्योंकि लोकतंत्र में जनता सिर्फ राहत पाने वाली भीड़ नहीं है।
वह जवाब मांगने वाली नागरिक भी है।
और बाढ़ के बाद सबसे जरूरी राहत शायद यही होगी—
सच सामने आए कि पानी ने सिर्फ शहर को कितना डुबोया नहीं, बल्कि हमारी आपदा-तैयारी की असली गहराई कितनी थी।
— सौरभ दुलहानी
- संपादकी




